काशी के ऐतिहासिक धरोहरों की संख्या अनगिनत है, सभी अपने में एक इतिहास समेटे हुए हैं। इन्हीं में एक ऐसी धरोहर शामिल है जिसने कोलकाता के दुर्गा पूजा को काशी में लाने का काम किया। वो धरोहर है काशी के संकरी गलियों में विराजमान बंगाली ड्योढ़ी। कहते हैं काशी में दुर्गा पूजा की शुरुआत यहीं से शुरू हुई। परंपरागत तरीके से आज भी हर साल बंगाली ड्योढ़ी में दुर्गा पूजा मनाई जाती है। आगे की स्लाइड्स में देखें...
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bangali dyodhi
- फोटो : अमर उजाला
वाराणसी के ठठेरी बाजार की संकरी गलियों से होते हुए भारतेंदु भवन से आगे लगभग 44 बिस्वा में ये बंगाली ड्योढ़ी की हवेली है। पूरे इलाके में यह ऐसी हवेली जिसके रास्ते तीन गलियों में चौखंभा, भिखारीदास लेन व सुतटोला में खुलते हैं। 1773 में कोलकाता के व्यापार आनंदमय मित्रा काशी आकर बस गए हैं।
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bangali dyodhi
- फोटो : अमर उजाला
व्यापारिक घराने से होने के कारण उन्होंने चौखंभा में हवेली बनवाई जिसे बंगाली ड्योढ़ी के नाम से जाना जाता है। तब से इस हवेली में कोलकाता की तर्ज पर ही दुर्गा पूजा शुरू हुई और यह परंपरा अभी तक चली आ रही है।
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- फोटो : अमर उजाला
ड्योढ़ी के पास दुकान चलाने वाले राजीव बताते हैं कि 300 साल पुराने इस भवन में स्थित दुर्गा मंदिर में स्थित विग्रह डोली में बैठकर आती है और पालकी में बैठकर जाती है। यह इनकी पारिवारिक परंपरा है। बंगाली ड्योढ़ी की दुर्गा पूजा एवं पूजा विधि का जिक्र भारतेंदु हरिश्चंद्र ने प्रेमयोगिनी में भी किया है। सार्वजनिक एवं संस्थागत पूजाएं बहुत बाद में आरंभ हुई।
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नवरात्री
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इस ड्योढ़ी में 1773 से ही लक्ष्मी पूजा व रथयात्रा की पूजा भी होती है। पूरी ड्योढ़ी एक भूलभुलैया जैसी प्रतीत होती है। हवेली के बीच में एक आंगन भी है जिसके चारों ओर कमरे बने हुए हैं। इस हवेली के हिस्से एक और इतिहास जुड़ा है।
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navratri puja 2018
लोगों का मानना है इसी बंगाली ड्योढ़ी से ही बीएचयू की स्थापना का तानाबाना बुना गया। पंडित मदन मोहन मालवीय व एनी बेसेंट ने काशी हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए इसी भवन में बैठकर रणनीति बनाई। काशी के गणमान्य लोगों के साथ घंटों इस हवेली में चर्चा हुआ करती थी।
करीब ढाई सौ साल पहले 1773 ई में बंगाली ड्योढ़ी से ही बनारस में सबसे पहले दुर्गा पूजा की शुरूआत हुई लेकिन इसे भव्य रूप दिया उनके पुत्र राजा राजेंद्र मित्र ने। देवी प्रतिमा का सिंहासन फ्रांस के कारीगरों द्वारा 18वीं सदी में बनाया गया था। यह पूरा चांदी का सिंहासन है। उस समय इसमें स्थापित होने वाली मूर्ति पर सोने का पत्तर चढ़ाया जाता था। आज भी हर दुर्गोत्सव के पहले इस प्रतिमा को सुनहरे और रुपहले रंगों का टच दिया जाता है।