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Chhannu Lal Mishra: पंचतत्व में विलीन हुए पं. छन्नूलाल मिश्र, मणिकर्णिका घाट पर पोते ने दी दादा को मुखाग्नि

Fri, 03 Oct 2025 02:37 PM IST
प्रगति चंद अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।

सार

पद्म विभूषण पंडित छन्नू लाल मिश्र पंचतत्व में विलीन हुए। बृहस्पतिवार की रात में मणिकर्णिका घाट पर उनके पोते राहुल ने दादा को मुखाग्नि दी। 
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पंचतत्व में विलीन हुए पं. छन्नूलाल मिश्र - फोटो : अमर उजाला
पद्म विभूषण पंडित छन्नू लाल मिश्र का बृहस्पतिवार की भोर में निधन हो गया। उन्होंने मिर्जापुर स्थित आवास पर 89 वर्ष की उम्र में अंतिम सांस ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उनको श्रद्धांजलि अर्पित की। मणिकर्णिका घाट पर रात नौ बजे राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार हुआ। पोते राहुल मिश्र ने मुखाग्नि दी।

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पंचतत्व में विलीन हुए पं. छन्नूलाल मिश्र - फोटो : अमर उजाला
बृहस्पतिवार की भोर में 4:15 बजे सुर सम्राट पद्मविभूषण पं. छन्नू लाल ने मिर्जापुर स्थित आवास पर अंतिम सांस ली। निधन की सूचना मिलते ही संगीत जगत में शोक की लहर दौड़ गई। आवास पर श्रद्धांजलि अर्पित करने वालों का तांता लगा रहा। पं. छन्नूलाल मिश्र की अंतिम इच्छा के अनुसार उनकी शवयात्रा दिन में एक बजे छोटी गैबी स्थित आवास पर पहुंची। शहर के गणमान्य लोगों ने उनको श्रद्धासुमन अर्पित किए। 
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पंचतत्व में विलीन हुए पं. छन्नूलाल मिश्र - फोटो : अमर उजाला
पुत्र तबलावादक पं. रामकुमार मिश्र के दिल्ली से वाराणसी आने के बाद शाम को 7:30 बजे पं. छन्नूलाल मिश्र की अंतिम यात्रा छोटी गैबी स्थित उनके आवास से निकली। मणिकर्णिका घाट पर पुलिस के जवानों ने उन्हें गार्ड ऑफ ऑनर प्रदान किया। इसके बाद पोते राहुल मिश्रा ने 8:56 बजे अपने दादा को मुखाग्नि दी।

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पंचतत्व में विलीन हुए पं. छन्नूलाल मिश्र - फोटो : अमर उजाला
पुत्री डॉ. नम्रता मिश्रा के अनुसार पं. मिश्र 7 महीने से ज्यादा समय से बीमार चल रहे थे। बीएचयू के सरसुंदरलाल अस्पताल में 13 सितंबर को उन्हें भर्ती कराया गया था। इसके बाद 27 सितंबर को उन्हें यहां से डिस्चार्ज कर दिया गया था और वह मिर्जापुर चले गए थे।

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पंचतत्व में विलीन हुए पं. छन्नूलाल मिश्र - फोटो : अमर उजाला
आजमगढ़ में हुआ था जन्म
पंडित छन्नूलाल मिश्र का जन्म 3 अगस्त 1936 को उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के हरिहरपुर गांव में हुआ था। उन्होंने अपने पिता से संगीत की प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की और आगे चलकर बनारस में संगीत की विधिवत शिक्षा ली। वहां उन्होंने किराना घराने के उस्ताद अब्दुल गनी खां से संगीत की गहन शिक्षा प्राप्त की। वह बनारस घराने की गायकी, विशेषकर ख्याल और पूरब अंग की ठुमरी के लिए प्रसिद्ध थे। उनकी प्रस्तुतियां भावपूर्ण और मधुरता से परिपूर्ण होती थीं, जिससे उन्हें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त हुई। वे पूरब अंग की ठुमरी के प्रमुख प्रतिपादक माने जाते हैं और उनके अनेक संगीत एल्बम जारी हुए हैं।

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