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खामोशी से गुजरा मुहर्रम, दिलों में गूंजा या हुसैन, यौमे आशूरा पर निभाई गई सिर्फ रवायत

Mon, 31 Aug 2020 10:34 AM IST
गीतार्जुन गौतम न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
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बाकर हुसैन के ईमान बाड़े पर अलम, ताबूत, और ताजिया का जियारत कर मातम करते लोग। - फोटो : अमर उजाला
यौमे आशूरा खामोशियों के साथ गुजर गया लेकिन हर दिल में या हुसैन की सदाएं गूंजती रहीं। वाराणसी में निकलने वाले ताजिए के जुलूस स्थगित रहे तो केवल मजलिस और छोटे ताजियों को ठंडा करके मुहर्रम की दसवीं तारीख की रवायत अदा की गई। रविवार को यौमे आशूरा का दिन मुस्लिम समुदाय के लिए बेहद खास था। इसी दिन एक इस्लामी हुकूमत ने अपने नबी के खानदान के लोगों को घेर कर भूखा प्यास मार डाला।
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जिले भर में उठने वाले तीन सौ से अधिक ताजिए तो नहीं उठे लेकिन शहर के इमामबाड़ों में छोट ताजिये तथा अलम व तुरबत के फूलों को ठंडा करके रवायत कायम रखी गई। सदर इमामबाड़ा, दरगाहे फातमान, शिवाला घाट, रामनगर टेंगरा मोड़ के इमामबाड़े में रवायत निभाई गई। इस दौरान पुलिस भी काफी संख्या में तैनात रही।
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शहर में 8 जगह दुलदुल का जुलूस 27 अंजुमन उठाती हैं मगर उन सब जुलूसों की जगह छोटी-छोटी मजलिसें ही की गईं। देर रात तक जगह-जगह शाम ए गरीबां की मजलिसें हुई। इन मजलिसों में उस समय को याद किया गया जब 10 मोहर्रम की शाम को इमाम हुसैन की शहादत के बाद यजीद की फौज ने इमाम हुसैन के खेमे जला दिए। उनका सामान लूट लिया। औरतों और बच्चों को बंधक बना लिया। 

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शिया जामा मस्जिद के प्रवक्ता हाजी फरमान हैदर ने बताया कि ये इमाम हुसैन की शहादत का 1382 वां साल था और हुसैनी कौम के लोग इसी तरह हर साल मोहर्रम मनाते रहेंगे। कर्बला का वा़केया रो कर मातम कर के बयान करके सुनाते रहेंगे ताकि फिर कोई बादशाह इस्लाम का नाम लेकर किसी पर भी जुल्म न कर पाए।
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शहर में पुलिस भी तैनात। - फोटो : अमर उजाला
झकझोर देता है कर्बला का वाकया 
कर्बला का वाकया आज भी इंसानियत को झकझोर देता है, जो लोग कर्बला नहीं जा पाते हैं वो अपने घरों में छोटे-छोटे ताजिये रखते हैं। ये ताजिये इमाम के रौजे की याद दिलाते हैं। मगर इस बार ताजिय़े नहीं उठा पाने का गम सबके चेहरे पर दिखा। इसमें बहुत से हिन्दू भी हैं जो हर साल ताजियादारी करते हैं।
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वाराणसी में निकला जुलूस (फाइल फोटो)। - फोटो : अमर उजाला
याद किए जाते हैं पूरी दुनिया में 
मुहर्रम की दसवीं तारीख है यही वो महीना और दिन है जब इस्लाम के प्रवर्तक पैगंबर हजरत मोहम्मद के नाती हजरत इमाम हुसैन अपने 72 साथियों के साथ कर्बला की जंग में शहीद हो गए थे। दरअसल किसी सल्तनत या तख्तो ताज के लिए नहीं हुई थी। कर्बला की जंग बल्कि ये एक ऐसी जंग थी, जिसमें यजीद की हजारों की सेना के सामने 72 साथियों का क्या मतलब था, हारना तय था।

लेकिन इसके बाद भी हजरत इमाम हुसैन ने हक और इस्लाम के लिए घुटने नहीं टेके और वह इस्लाम व इंसानियत के लिए शहीद होकर बहुत कुछ अपनी कौम से कह गए। यही वजह है कि आज पूरी दुनिया में उन्हे उनकी बहादुरी के लिए याद किया जाता है।
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फाइल फोटो
इस्लाम जिंदा होता है कर्बला के बाद 
यजीद ने सोचा था कि इमाम हुसैन के साथ इस्लाम खत्म हो जाएगा, मगर इस्लाम जिंदा होता है कर्बला के बाद। कर्बला की जंग के बाद से ही मुसलमानों ने इस्लामी कलेंडर के नए साल में खुशी मनाना छोड़ दिया। करीब 1400 साल बीतने के बाद मुस्लिम इस माह में खुशी जैसे शादी जैसे कार्यक्रम नहीं करते हैं।
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