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आजमगढ़ सीट पर मुकाबला हुआ दिलचस्प, 'निरहुआ' की एंट्री से बिगड़ा अखिलेश का जातिगत समीकरण

Mon, 06 May 2019 06:16 PM IST
Sayali Maurya न्यूज डेस्क,अमर उजाला,आजमगढ़
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अखिलेश यादव-दिनेश लाल यादव निरहुआ - फोटो : Amar Ujala
आजमगढ़ में दो लोकसभा सीटों आजमगढ़ और लालगंज संसदीय सीट के लिए चुनाव होने हैं। इस बार आजमगढ़ संसदीय सीट जातीय समीकरण में उलझी हुई है। इसका कारण कोई और नहीं बल्कि भाजपा प्रत्याशी दिनेश लाल यादव 'निरहुआ' है। फिल्मों से राजनीति में एंट्री करते ही 'निरहुआ' ने अखिलेश के 'यादव फैक्टर' को गड़बड़ कर दिया। पढ़ें आगे की स्लाइड्स में...
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जातीय समीकरण की गोटी सेट कर भाजपा भी इस सीट पर एक बार अपनी परचम लहरा चुकी है। इस बार भी सपा-बसपा गठबंधन को यादव, मुस्लिम और दलित वोटरों का भरोसा है। वहीं भाजपा परंपरागत मतों के साथ यादव और दलित वोटरों में सेंधमारी कर रही है। बता दें कि आजमगढ़ संसदीय क्षेत्र में यादव, मुस्लिम और दलित मतदाताओं की संख्या 49 प्रतिशत है। शेष 51 प्रतिशत में सवर्ण और अन्य मतदाता है। 
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अखिलेश और निरहुआ (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला
इस संसदीय क्षेत्र में सबसे ज्यादा यादव मतदाता है। इसे देखते हुए सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव ने इस सीट को चुनाव लड़ने के लिए चुना है। इस सीट से उनके पिता और सपा संरक्षक मुलायम सिंह यादव भी 2014 में चुनाव लड़कर जीत चुके हैं। इस बार चुनाव में बसपा का भी साथ मिलने से दलितों वोटरों के बल पर सपा अपनी जीत तय मानकर चल रही है। 

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अगर परिस्थितियों पर गौर करें तो अभी तक वह दलित मतदाताओं को पूरी तरह से अपने पक्ष में मतदान के लिए तैयार नहीं कर पाई है। वहीं भाजपा ने भी बसपा के सपा से गठबंधन के बाद दलित वोटरों को लुभाने का कार्य शुरू कर दिया है। भोजपुरी स्टार दिनेश लाल यादव 'निरहुआ' की छवि को भुनाने और यादव वोटों में सेंधमारी के प्रयास में बीजेपी ने उम्मीदवार बनाया है। 
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अपनी छवि के कारण दिनेश लाल यादव 'निरहुआ' अपनी बिरादरी के साथ ही दलित वोटरों में भी ज्यादा सेंधमारी करते हुए दिखाई दे रहे हैं। अगर यही स्थिति कायम रही तो दोनों के बीच कांटे की टक्कर देखने को मिलेगी। फिलहाल लोगों का मानना है कि आठ मई को होने वाली सपा और बसपा की संयुक्त रैली के बाद ही स्थिति स्पष्ट होगी कि दलित मतदाता साइकिल की सवारी करने को तैयार है या नहीं है। 
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अगर इस संयुक्त रैली के बाद भी यही स्थिति बनी रहती है तो उलटफेर की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता है। एक तरफ सवर्ण और अन्य पिछड़ी जातियां भाजपा के पक्ष में लामबंद नजर आ रही हैं तो यादव और मुस्लिम बिरादरी सपा बसपा गठबंधन के पक्ष में पूरी तरह से लामबंद नजर आ रही है। 
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12 मई को मतदान के बाद 23 मई को होने वाली मतगणना में ऊंट किस करवट बैठेगा यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा। वैसे अगर आजमगढ़ संसदीय सीट की बात करें तो आजादी के बाद से अब तक हुए 16 लोकसभा चुनाव में 12 बार यादव प्रत्याशी को ही जीत मिली है। इस बार भी अखिलेश जीतें या 'निरहुआ' 13वीं बार भी यादव प्रत्याशी को इस सीट पर जीत हासिल होगी।
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