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काशी तमिल संगमम: नाही मारो नजरिया के बाण… नमो घाट पर काशी–तमिल सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने बांधा समां

Mon, 15 Dec 2025 04:40 PM IST
प्रगति चंद अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।

सार

काशी तमिल संगमम में नमो घाट पर काशी-तमिल सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने समां बांध दिया। कलाकारों की प्रस्तुति ने दर्शकों का मन मोह लिया। 13वें दिन मुक्ताकाशीय मंच पर सांस्कृतिक आयोजन हुआ।

 
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काशी तमिल संगमम् 4.0 - फोटो : अमर उजाला
काशी एवं तमिलनाडु से आए कलाकारों ने विविध और मनोहारी प्रस्तुतियों से उत्तर और दक्षिण भारत की सांस्कृतिक एकता को जीवंत किया। नमो घाट के मंच पर संस्कृति मंत्रालय की ओर से उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र प्रयागराज एवं दक्षिण क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र की ओर से 13वें दिन रविवार को मुक्ताकाशीय मंच पर सांस्कृतिक आयोजन हुआ।
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काशी तमिल संगमम् 4.0 - फोटो : अमर उजाला
रविवार को सांस्कृतिक कार्यक्रम की प्रथम प्रस्तुति निश्चल कुमार उपाध्याय के गायन की रही। तबले पर भानुशंकर चौबे तथा सह-गायन में दिवित दुबे ने संगत की। द्वितीय प्रस्तुति डॉ. पूनम शर्मा की रही। उन्होंने देवी गीत निबिया की गछिया… से गायन का शुभारंभ हुआ। इसके पश्चात दादरा शैली में नाही मारो नजरिया के बाण… की प्रस्तुति ने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। इस प्रस्तुति में तबले पर राकेश रोशन, ढोलक पर अमित, बेंजो पर संजय, पैड पर राहुल कुमार तथा सह-गायन में खुशी कुमारी, एंजल केशरी, काव्या मुखर्जी एवं दिव्या शर्मा ने प्रभावशाली संगत की।
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काशी तमिल संगमम् 4.0 - फोटो : अमर उजाला
तृतीय प्रस्तुति तमिलनाडु से आए आर. सतीश के पारंपरिक ओइलियट्टम एवं करगम लोक नृत्य की रही। चतुर्थ प्रस्तुति नई दिल्ली की वैष्णवी के भरतनाट्यम नृत्य की रही। इसमें कलाकार वैष्णवी, लक्ष्मी एवं प्रानथी ने शास्त्रीय नृत्य की भाव-भंगिमाओं से दर्शकों को अभिभूत किया। 

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काशी तमिल संगमम् 4.0 - फोटो : अमर उजाला
पंचम प्रस्तुति वाराणसी की शिवानी मिश्रा के कथक नृत्य की रही। जिसमें शिवानी मिश्रा, सौरभ त्रिपाठी, करिश्मा केसरी, सृष्टि तिवारी, रानू चौबे, प्रिंसी, नौशीन अंसारी, जाह्नवी राय, सुरभि जैस एवं अंकित कुमार ने समूह नृत्य के माध्यम से कथक की सजीव प्रस्तुति दी। छठी एवं अंतिम प्रस्तुति तमिलनाडु के आर. सतीश द्वारा डमी हॉर्स एवं कावड़ीअट्टम लोक नृत्य की रही।
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काशी तमिल संगमम् 4.0 - फोटो : अमर उजाला
गंगा की कविता और कावेरी के दर्शन वाला ही शिक्षित भारतीय मन : डॉ. सुकांत मजूमदार
आज की पीढ़ी को भाषा की दीवारों को तोड़ना होगा। जिस मन में गंगा की कविता और कावेरी का दर्शन एक साथ समाहित हो जाए, वही वास्तव में शिक्षित भारतीय मन है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक भारत, श्रेष्ठ भारत की परिकल्पना के तहत आयोजित काशी तमिल संगमम प्रेरक पहल है जो दक्षिण और उत्तर को एक कर रही है। काशी तमिल संगमम एक भारत–श्रेष्ठ भारत की भावना का सजीव और अनुभवात्मक उदाहरण है। उक्त बातें केंद्रीय शिक्षा राज्य मंत्री डॉ. सुकांत मजूमदार ने कहीं।
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काशी तमिल संगमम् 4.0 - फोटो : अमर उजाला
नमो घाट पर आयोजित कार्यक्रम में डॉ. सुकांत मजूमदार ने कहा कि काशी की यह यात्रा सभी के लिए आनंददायक है और यह आयोजन चोल और पांड्य जैसी महान सभ्यताओं से आकार पाई भारत की जीवंत, बहुरंगी जीवन-परंपराओं का उत्सव है। उन्होंने काशी आए सभी प्रतिभागियों का हार्दिक स्वागत करते हुए कहा कि काशी तमिल संगमम का यह संस्करण भाषायी सेतुओं को और सुदृढ़ करने के उद्देश्य से समर्पित है तथा इसकी थीम तमिल करकलाम (तमिल सीखें) प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उस पहल का हिस्सा है, जो भारत की सभ्यता और आत्मा को जोड़ने का कार्य करती है। 
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काशी तमिल संगमम् 4.0 - फोटो : अमर उजाला
डॉ. मजूमदार ने कहा कि प्रधानमंत्री के शब्दों में काशी और तमिलनाडु भारत की सभ्यता और ज्ञान के केंद्र हैं। यदि काशी भारतीय आध्यात्मिक चेतना की नाभि है, जहां मां गंगा के तट पर अनवरत तीर्थयात्री आते हैं, तो तमिलनाडु वह भूमि है जहां कावेरी के तट पर भक्ति और दर्शन की अविरल धारा प्रवाहित होती है। उन्होंने कहा कि उत्तर बाबा विश्वनाथ के चरणों में नमन करता है और दक्षिण रामेश्वरम से उसी भक्ति-परंपरा को आगे बढ़ाता है। यह एक अविच्छिन्न आध्यात्मिक परिपथ है। काशी तमिल संगमम इसी प्राचीन, निरंतर साझा सभ्यता और नियति का उत्सव है। 
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काशी तमिल संगमम् 4.0 - फोटो : अमर उजाला
विद्यार्थियों से संवाद करते हुए डॉ. सुकांत मजूमदार ने कहा कि आज की पीढ़ी को भाषा की दीवारों को तोड़ना होगा और राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 की भावना के अनुरूप भारतीय शिक्षा प्रणाली की बहुभाषिक समृद्धि को अपनाना होगा। उन्होंने उत्तर भारत के विद्यार्थियों से तमिल सीखने और दक्षिण भारत, विशेषकर तमिलनाडु के विद्यार्थियों से अपनी भाषा और संस्कृति को साझा करने का आह्वान किया। उन्होंने भारत की एकता को ठोस और जीवंत बताते हुए कहा कि यह हमारी साझा थाली, मसालों की सुगंध, कांचीपुरम की रेशमी साड़ियों और बनारसी सिल्क, तथा दोनों क्षेत्रों के विद्वानों और शिल्प परंपराओं में प्रत्यक्ष दिखाई देती है। उन्होंने प्रतिभागियों से आग्रह किया कि वे यहां केवल दर्शक बनकर न रहें, बल्कि मित्रता करें, संस्कृति को आत्मसात करें, अनुभवों को साझा करें और लौटकर साझा सांस्कृतिक सेतु के दूत बनें। उन्होंने कहा कि काशी तमिल संगमम दोनों संस्कृतियों की साझा धड़कन को स्वर देता है।
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