गुरु नानक देव ने जब उस पर दृष्टि डाली तो कुत्ते के स्थान पर सुंदर स्वरूप धोती, जनेऊ, तिलक, माला आदि धारण किए एक विद्वान बैठा नजर आया। लोगों के पूछने पर उसने बताया कि मैं भी एक समय विद्वान था, लेकिन मेरे भीतर ईष्या व अहंकार भरा हुआ था। काशी में आने वाले सभी साधु, संत, महात्मा, जोगी, सन्यासी को अपने शास्त्रार्थ से निरुत्तर कर यहां से भगा देता था। एक बार एक महापुरुष से काफी देर तक वाद-विवाद करता रहा। उन्होंने मेरे हठधर्मिता पर मुझे शाप दे दिया। माफी मांगने पर उन्होंने कहा कि कलयुग में गुरु नानक जी का आगमन होगा, उनकी कृपा दृष्टि से ही तेरा उद्धार होगा।