काशी में आने वाले अतिथियों का स्वागत बेहद ही भव्य ढंग से किया गया। प्रवासियों के आते ही उनको शहनाई की धुन सुनाई दी। सभी प्रवेश द्वारों पर बुंदेलखंड झांसी का राई नृत्य हो रहा था। वहीं बंगाल उड़ीसा और झारखंड में प्रचलित आदिवासी नृत्य छाऊ भी देखने को मिला। साथ ही महोबा के प्रसिद्घ नृत्य में पाई डंडा लोक नृत्य भी देखने को मिला है। कुछ ऐसी ही नजारा तीन दिवसीय प्रवासी भारतीय दिवस के दौरान देखने को मिल रहा है। आगे की स्लाइड्स में देखें...
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- फोटो : amar ujala
बाबतपुर एयरपोर्ट से लेकर ऐढ़े गांव स्थित टेंट सिटी (बालेश्वर अग्रवाल नगर), दीनदयाल हस्तकला संकुल से काशी के घाटों पर पूरे ठाठ-बाट के साथ अपनों का स्वागत किया गया। अतिथि देवो भव: की परंपरा का पालन करने वाली काशी वैभवशाली सांस्कृतिक और कलात्मक विरासत के साथ दुनिया भर से आए मेहमानों के सत्कार में खिल उठी है।
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प्रवासियों के स्वागत के लिए लंबे समय से की जा रही तैयारियां सोमवार को मुकम्मल नजर आईं। जिधर भी देखा, काशीवासी बांहें फैलाए अपनों की आवभगत को उत्सुक रहे। जगह-जगह लगाए गए अलग-अलग देशों के राष्ट्रीय ध्वज, उनके स्वागत के लिए लगाए गए होर्डिंग, सजाए गए बाजार और दीवारों पर उकेरी गई यहां की खासियतों को देखकर प्रवासी बरबस बोल रहे हैं-काशी ऐसी है। इसमें अनगिन रंग हैं। कभी सोचा न था। हमारा भाग्य है कि हम ये सब न देख रहे हैं, उल्लास को महसूस कर रहे हैं।
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काशीवासी प्रवासियों को संस्कृति, सभ्यता और अध्यात्म के अद्भुत, अविस्मरणीय और अलौकिक दर्शन कराकर उन्हें कभी न भूलने वाली यादें दे रहे हैं। ये यादें उनके जेहन में सदियों तक जीवंत रहेगी। काशी के लोग ही नहीं, यहां के दर-ओ-दीवार ने भी अपने आतिथ्य परंपरा का परदेसियों का मान रख रही हैं।
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सामंजस्य को देखकर प्रवासी निहाल हो रहे हैं। उन्हें सही मायनों में वसुधैव कुटुंबकम की भावना दिख रही है। प्रवासियों की मेहमाननवाजी में पूरी काशी नए कलेवर और रंग में नजर आ रही है। चमकती सड़कों से लेकर बोलती दीवारें, रौशनी से जगमगाते घाटों पर बने महल से लेकर सीढ़ियां जैसे एक नई ही आभा में प्रवासियों के स्वागत के लिए तैयार हैं। इस कलेवर में लोक संस्कृति के रंग भी हैं।
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अलग-अलग राज्यों से आए लोक कलाकारों के अस्सी से राजघाट तक छाऊ, ललिता घाट पर कालबेलिया नृत्य, करमा, बहरुपिया लोकनृत्यों के जरिए हिंदुस्तान भर की संस्कृति की झलक प्रवासी देख रहे हैं।
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सनातनी परंपरा, शांति एवं सद्भाव का संदेश देने के लिए प्राचीन चेतसिंह घाट पर राम दरबार की झांकी सजी है तो रावण का भी दरबार सजा है। क्षीरसागर में भगवान विष्णु और लक्ष्मी की झांकी लुभा रही। महिषासुर मर्दिनी की आकर्षक झांकी प्रवासियों के दिल को छू रही है। पंचगंगा घाट पर कलाकारों ने पूर्वांचल के लोकगीत प्रस्तुत किए।
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झांसी से रघुबीर सिंह की अगुवाई में आए कलाकारों ने सिंधिया घाट पर पाईडंडा पारंपरिक लोकनृत्य से दिल जीत लिया। भगवान श्रीराम के अयोध्या लौटने पर यह दीपोत्सव के रूप में मनाया जाता है। टेंट सिटी में प्रवासियों का स्वागत शहनाई की धुनों से हो रहा है।
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झारखंड के कलाकारों ने छाऊ नृत्य पेश किया। खास वेशभूषा में कलाकारों ने अपनी लोक संस्कृति से प्रवासियों को परिचित कराया। सृष्टिधर महतो टीम का नेतृत्व कर रहे हैं। इसी तरह झांसी के निशांत भदौरिया के निर्देशन में कलाकारों ने यहां राई लोक नृत्य की प्रस्तुति दी।
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महोबा के पाई डंडा लोकनृत्य की हैरतअंगेज कलाबाजी भी खूब रही। रामचरण यादव और उनके कलाकारों ने नृत्य से मुग्ध कर दिया। फूलों, पताकाओं, रंगोली से सजाई गई काशी प्रवासियों को बेहद न्यारी नजर आ रही है।
नई-नई सी काशी के आकर्षण और मेजबानी व अपनत्व का भाव पाकर परदेसी मेहमान भाव विह्वल हो उठे हैं तो खुद काशीवासी अपने ही अंदाज में उनके लिए पलक-पांवड़े बिछाने के अवसर को अपना सौभाग्य मान रहे हैं।