किसी-किसी को भगवान ऐसा जख्म देता है, जिसे वह ताउम्र नहीं भूलता। कुछ ऐसा ही वाकया वाराणसी कैंट के समीप फ्लाईओवर हादसे के शिकार सेवानिवृत्त प्रधानाध्यापक खुशिहाल राम के परिजनों के साथ हुआ। गाजीपुर जिले के खुशिहाल राम अपने बड़े बेटे शिवबचन राम के साथ कैंसर से पीड़ित अपने तीसरे बेटे संजय राम को इलाज कराने के लिए निजी बोलेरो से लेकर मंगलवार की सुबह सात बजे बीएचयू आए थे। लौटते समय संजय ने अपनी पत्नी से एक बात कही, जिसे जानकर कोई भी रो देगा। आगे की स्लाइड्स में पढ़ें...
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- फोटो : अमर उजाला
नंदगंज थाना क्षेत्र के सहेड़ी गांव निवासी सेवानिवृत्त प्रधानाध्यापक खुशिहाल राम (70) अपने बड़े बेटे शिवबचन राम (40) के साथ कैंसर से पीड़ित अपने तीसरे बेटे संजय राम (35) को इलाज कराने के लिए निजी बोलेरो से लेकर मंगलवार की सुबह सात बजे बीएचयू के लिए निकले। वाहन संजय के मित्र मुड़वल निवासी वीरेंद्र यादव (35) चला रहे थे। संजय का इलाज कराने के बाद सभी लोग खुशी-खुशी बीएचयू से घर वापस लौट रहे थे।
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उनको क्या पता था कि लहरतारा कैंट मार्ग पर रेलवे कॉलोनी के सामने निर्माणाधीन फ्लाईओवर उनका काल बन कर खड़ा है। जैसे ही बोलेरो सवार वहां पहुंचे काल ने अपना खेल दिखाया और सभी को अपने आगोश में ले लिया। शाम को करीब छह बजे जैसे ही परिजनों को घटना की जानकारी मिली दोनों परिवारों पर दुख का पहाड़ टूट पड़ा। महिलाओं के करुण-क्रंदन को सुन हर किसी का कलेजा फटा जा रहा था। हादसे के बाद सहेड़ी व मुड़वल गांवों में मातमी सन्नाटा छा गया।
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पिता और भाई के साथ इलाज करा कर घर लौट रहे संजय ने शाम चार बजे अपनी पत्नी सरोजा से मोबाइल पर कहा कि खाना बना। क्या बना है, बहुत भूख लगी है। जब परिजनों को यह पता चला कि सभी लोग इलाज कराकर घर वापस लौट रहे हैं, तो सभी भोजन की तैयारी में जुट गए थे। करीब दो घंटे बीत गए, लेकिन लोग नहीं पहुंचे, तो घबराहट होने लगी।
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संजय के मोबाइल पर फोन किया गया, लेकिन संजय ने न उठा कर किसी और ने मोबाइल फोन उठाया और कहा कि वाराणसी में बड़ा हादसा हो गया है। सभी बेचैन हो उठे। उनको क्या पता था कि घर वापस लौट रहे सभी लोग हमेशा के लिए अलविदा कह देंगे और मौत की आगोश में सो जाएंगे।
वहीं दूसरी तरफ हादसे में मारे गए वीरेंद्र यादव (35) अपने माता-पिता के इकलौते पुत्र थे। मुड़वल गांव में जब वृद्ध बाप ने अपने इकलौते बेटे की अर्थी को कंधा दिया, तो ग्रामीण भी फफक पड़े। गांव में महिलाओं के करुण-क्रंदन से हर किसी का कलेजा फटा जा रहा था। बेटे को खो चुके वृद्ध पिता केदारनाथ की जुबान थर-थर कांप रही थी। आंखें पथराई हुई थी, जैसे बेटे के गम ने आंखों से आंसू को ही सुखा दिया हो। इधर वीरेंद्र के तीन मासूम बेटे प्रिंस, शिवांशु और अंश अपने पिता की मौत के दर्द से दबे जा रहे थे।