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महत्व: देवताओं के विजय दिवस की प्रतीक है देव दीपावली, महादेव ने तोड़ा था काशीराज दिवोदास का अहंकार 

Mon, 30 Nov 2020 10:39 AM IST
गीतार्जुन गौतम न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
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देव दीपावली।
मां जाह्नवी के अर्द्ध चंद्राकार घाटों की शृंखला देव दीपावली की रात अद्भुत छटा बिखेरती है। घाटों पर विद्युत झालरों की झिलमिलाहट और असंख्य दीयों में टिमटिमाती रोशनी की मालाएं, घंटों की आवाज, मंत्रों और शंखों की गूंज मन मोह लेती है। महसूस होता है कि देवता स्वर्ग से धरती पर उतर आए हों। पुराणों में मान्यता है कि काशी की देव दीपावली देवताओं के विजय दिवस की प्रतीक है। देखें अगली स्लाइड्स...।
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केंद्रीय ब्राह्मण महासभा के अध्यक्ष सतीश चंद्र मिश्रा के अनुसार, पुराणों में वर्णित है कि काशी के राजा दिवोदास द्वारा काशी में देवताओं के प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। दिवोदास के अहंकार से देवलोक में हड़कंप मच गया। कोई देवी-देवता काशी आने को तैयार नहीं होता।
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दशाश्वमेध घाट पर श्रद्धालुओं ने लगाई डुबकी। - फोटो : अमर उजाला
कार्तिक मास में पंचगंगा घाट पर गंगा स्नान के लिए देवता साधुओं के वेश में आते थे और स्नान कर चले जाते। उसी दौरान त्रिपुर नामक दैत्य का भगवान भोलेनाथ ने वध किया और राजा दिवोदास के अहंकार को भी नष्ट कर दिया। राक्षस के मारे जाने के बाद देवताओं ने स्वर्ग में दीप जलाकर खुशी मनाई।

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इस दिन को देवताओं ने विजय दिवस माना और खुशी मनाने के लिए कार्तिक पूर्णिमा पर काशी आने लगे। काशी आने का मकसद भगवान भोलेनाथ की महाआरती करने का भी था। इसीलिए इस उत्सव को देव दीपावली नाम दिया गया।
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देव दीपावली पर पीएम मोदी के आने की खुशी में डोमरी गांव के लोगों ने गंगा पार दीये जलाए। - फोटो : अमर उजाला
वैसे भी कार्तिक पूर्णिमा को चंद्रमा का संपूर्ण प्रकाश पृथ्वी को प्रकाशित करता है और दीयों के प्रकाश के साथ मिलकर एक विशेष प्रकार की आभा उत्पन्न करता है, जिससे देवताओं की प्रसन्नता की अनुभूति हर किसी को होती है। ऐसा लगता है मानो पृथ्वी पर पूरा देवलोक उतर आया हो।
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