महाश्मशान मणिकर्णिका पर स्वयं भूतभावन अपने गणों केसाथ होली खेलने आते हैं। वह आगे कहते हैं कि लखि सुंदर फागुनी छटा के, मन से रंग-गुलाल हटा के चिता भस्म भर झोरी..दिगंबर खेले मसाने में होरी..। ऐसा दृश्य कहां देखने को मिलेगा कि भगवान शिव के गण अपने झोली में चिता भस्म की राख भरकर मन भर होली खेलकर तृप्त हो जाते हैं। काशी की होली में राग और विराग दोनों नजर आते हैं। पं. मिश्र गुनगुनाते हैं कि गोप न गोपी श्याम न राधा, ना कोई रोक ना कवनो बाधा, ना साजन ना गोरी दिगंबर खेले मसाने में होरी...। शिव की नगरी काशी की होली की बात ही निराली होती है। जब महादेव महाश्मशान में उतरते हैं तो भूतनाथ की मंगल-होरी, देखि सिहाएं बिरिज के गोरी, धन-धन नाथ अघोरी.. दिगंबर खेलैं मसाने में होरी...।