चालीस घंटे का निर्जला व्रत भी श्रद्धा को डिगा नहीं सका। ‘उगा हो सूरज देव भइल अरघा की वेर’ गाती हुईं महिलाएं गुजरीं तो पूरा माहौल भक्तिमय हो गया। उमंग, उत्साह, उल्लास ऐसा जैसे 40 नहीं चार घंटे की पूजा हो। वाराणसी में ठीक वैसा ही नजारा बुधवार भोर में चार बजे दिखा जैसा मंगलवार शाम को घाटों पर देखा गया था। आगे की स्लाइड्स में देखें..
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- फोटो : अमर उजाला
आस्था के महापर्व छठ पर काशी के सात किलोमीटर लंबे घाटों की श्रृंखला पर बुधवार की सुबह विहंगम नजारा नजर आया। ढोल-नगाड़ों की थाप, आतिशबाजी और जगह-जगह मंगलगान हुआ। वेदियों पर सर्व मंगल की कामना से जले अखंड दीपों की लौ ने जन-जन के तन-मन को प्रकाशमान किया। मौका था, सूर्योपासना के डाला षष्ठी व्रत पर उदयगामी सूर्य को अर्घ्यदान का। घाटों के आसपास मेले जैसा दृश्य नजर आया। आस्था के इस विहंगम नजारे को लोग कैमरे में कैद करते रहे।
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काशी में गंगा तट पर राजघाट से विश्वसुंदरी पुल तक व्रतियों की अटूट कतार ऐसे ही भक्तिभावों में रमी रही। गंगा-वरुणा तटों से कुंडों-सरोवरों तक ब्रह्म मुहूर्त में बाजे-गाजे के बीच लोकोत्सव की अनूठी छटा निखरी। हजारों की तादाद में नावों पर सवार होकर विदेशी सैलानी अस्सी से राजघाट तक अर्घ्य देने की व्रतियों की आस्था को निहारा।
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सूर्य देव के प्रति ऐसा समर्पण शायद ही किसी व्रत, त्योहार में देखा जाता हो। घाटों पर संस्कृति, समर्पण और श्रद्धा का संगम विहंगम नजारा बन गया। दीप, धूप, फल-फूल से लदे सूप को लेकर पूरब की ओर मुंह करके सूर्यदेव का इंतजार होता रहा। उगते सूर्य को अर्घ्य देने के साथ चार दिन की पूजा का पारण हुआ।
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तड़के 3:30 बजे से ही अरमापुर घाट व्रतीं महिलाओं और उनके परिजनों से खचाखच भर गया था। अल सुबह चार बजे से वेदी पूजन का दौर शुरू हो गया। वेदी के चारो और जल रहे घी के दीये घाट किनारे की रौनक बढ़ा रहे थे। यहां हर कोई खास था और कोई खास भी नहीं था। घाट किनारे फर्श पर बैठीं महिलाएं छठीं माता के गीत गा रही थीं। उनके साथ बच्चे भी आए थे।
महिलाओं के चेहरे पर 40 घंटे के व्रत की शिकन तक नहीं थी। एक साथ जब उगते सूर्य को अर्घ्य देने के लिए नहर में उतरीं तो नजारा ही कुछ और था। सुबह 6 बजे सूर्यदेव के इंतजार में महिलाएं पानी में उतर गई। दीप, धूप, फल-फूल से लदे सूप को लेकर पूरब की ओर मुंह करके सूर्यदेव का इंतजार होता रहा।