उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ में एक ‘भूत’ ने दो पूर्व प्रधानमंत्रियों के खिलाफ चुनाव लड़ा। ‘भूत’ ने न सिर्फ दो प्रधानमंत्रियों के खिलाफ चुनाव लड़ा बल्कि अपने चचेरे भाई का अपहरण किया। और तो और पत्नी को विधवा पेंशन के लिए आवेदन कराया। पूरा मामला जानकर कोई भी हैरान हो जाएगा आगे की स्लाइड्स में देखें...
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- फोटो : अमर उजाला
आजमगढ़ के एक व्याक्ति को भू-राजस्व अभिलेखों में खुद को जिंदा साबित करने के लिए 18 वर्ष तक संघर्ष करना पड़ा। आखिरकार वह खुद को जिंदा करने में सफल रहा। मुआवजे और दोषी अधिकारियों-कर्मचारियों के खिलाफ हाईकोर्ट में चल रहे मामले को लेकर एकबार फिर वह चर्चा में हैं। हाईकोर्ट ने सरकार ने पूछा है कि ‘भूत को मुआवजा क्यों न दिया जाए’। साथ ही कोर्ट ने जिलाधिकारी से इस मामले में दोषी अधिकारियों के नाम पूछे हैं।
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जिले के निजामाबाद तहसील क्षेत्र के खलीलाबाद गांव निवासी लालबिहारी ‘मृतक’ के पिता का बचपन में ही निधन हो गया था। पिता की मौत की बाद वह मुबारकपुर थाना क्षेत्र के अमिलो में रहते थे। पट्टीदारों ने इसका फायदा उठाकर अभिलेखों में उन्हें मृत दिखाकर उनकी सारी संपत्ति पर कब्जा कर लिया। व्यवसाय के लिए ऋण लेने के लिए जाति और निवास पत्र बनवाने के क्रम में उन्हें पता चला कि 30 जुलाई 1976 को न्यायालय नायब तहसीलदार सदर ने उन्हें अभिलेखों में मृत घोषित कर दिया है। इसके बाद खुद को जीवित घोषित कराने के लिए उन्होंने तमाम जतन किए।
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- फोटो : अमर उजाला
नौ सितंबर 1986 को उन्होंने विधानसभा में पर्चा फेंका। वह तत्कालीन विधायक स्व. काजी कलीमुर्रहमान के पास पर विधानसभा में घुसे थे। इस पर भी बात नहीं बनी तो उन्होंने निजामाबाद एसओ को 500 रुपये घूस देकर खुद को 151 धारा में जेल भेजने के लिए कहा। लेकिन जैसे ही एसओ को उनके बारे में जानकारी हुई उसने पल्ला झाड़ लिया। इसके बाद उन्होंने अपने चचेरे भाई का अपहरण कर लिया कि शायद पुलिस उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दे लेकिन पुलिस ने भाई को तो छुड़ाया लेकिन मृतक के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की।
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1988 में इलाहाबाद संसदीय सीट से उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह और बसपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष कांशीराम के खिलाफ चुनाव लड़ा। लेकिन मकसद हल नहीं हुआ। वर्ष 1989-90 में उन्होंने अमेठी से राजीव गांधी के खिलाफ तथा 1992 में आजमगढ़ की मुबारकपुर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा। यही नहीं खुद के जिंदा रहते उन्होंने अपनी पत्नी को विधवा पेंशन दिलाने के लिए आवेदन किया। लंबी लड़ाई के बाद जिला प्रशासन ने 30 जून 1994 को लालबिहारी को अभिलेखों में जिंदा कर दिया।
फिल्म निर्माता सतीश कौशिक ने लालबिहारी से मुलाकात की व वर्ष 2004-05 में उन्होंने उनके संघर्षो पर आधारित फिल्म बनाने का अधिकार खरीद लिया। सतीश कुछ दिनों पूर्व लालबिहारी से मिलने भी आए थे। वर्ष 2005 में मुआवजे के लिए उन्होंने अधिवक्ता कृष्ण कन्हैया पाल की मदद से याचिका दायर की। जिसकी सुनवाई इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ कर रही है। सुनवाई के दौरान 19 फरवरी को हाईकोर्ट ने सरकार से साफ शब्दों में कहा कि लालबिहारी को उनके द्वारा झेली गयी विपत्तियों और संत्रास के लिए 25 करोड़ का मुआवजा क्यों नहीं मिलना चाहिए़।