सौरभ राजपूत हत्याकांड में सजा सुनाए जाने के बाद पोस्टमार्टम करने वाली टीम और तत्कालीन विवेचक ने मामले की खौफनाक यादें साझा कीं। जानिए शव की स्थिति और 54 दिन में दाखिल चार्जशीट की कहानी।
मेरठ के सौरभ राजपूत हत्याकांड में अदालत का फैसला आने के बाद इस मामले से जुड़े लोगों की पुरानी यादें फिर ताजा हो गई हैं। पोस्टमार्टम करने वाली चिकित्सीय टीम से लेकर विवेचना करने वाले पुलिस अधिकारी तक उस वारदात को याद कर रहे हैं, जिसने पूरे देश का ध्यान मेरठ की ओर खींचा था। शव की हालत और हत्या के तरीके ने पोस्टमार्टम टीम को भी झकझोर दिया था। वहीं, पुलिस अधिकारियों के लिए यह मामला साक्ष्य जुटाने और समयबद्ध तरीके से चार्जशीट दाखिल करने की बड़ी चुनौती रहा।
नीले ड्रम में शव मिलने के बाद यह मामला देशभर में चर्चा में आया था। समय बीतने के बाद भी इस हत्याकांड का जिक्र सोशल मीडिया पर होता रहा है। अब अदालत के फैसले के बाद पोस्टमार्टम और विवेचना से जुड़े लोगों ने उस समय की घटनाओं को याद किया है।
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सौरभ हत्याकांड
- फोटो : अमर उजाला
ड्रम और सीमेंट से शव निकालने में लगा करीब एक घंटा
पोस्टमार्टम करने वाली चिकित्सीय टीम के मुताबिक, मेडिकल कॉलेज की मॉर्चरी में एक साल में करीब 1,500 से 1,800 पोस्टमार्टम होते हैं। इनमें से टीम के सदस्य लगभग 700 से 800 पोस्टमार्टम में शामिल रहते हैं। इसके बावजूद सौरभ राजपूत का मामला उनके लिए बेहद विचलित करने वाला था।
टीम ने बताया कि शव को ड्रम में डालने के बाद उसमें डस्ट और सीमेंट भरा गया था। इसके ऊपर तक पानी भरे जाने से सीमेंट जम गया था और शव उसके बीच फंस गया था। टीम के अनुसार, हवा नहीं पहुंच पाने के कारण शव में सामान्य परिस्थितियों जैसी सड़न और दुर्गंध कम थी।
पोस्टमार्टम हाउस में पहले ड्रम को कटर से काटा गया। इसके बाद जमे हुए सीमेंट को हटाकर शव बाहर निकाला गया। इस प्रक्रिया में करीब एक घंटा लगा। शव की हालत देखकर चिकित्सीय टीम भी हैरान रह गई थी।
दिल पर चाकू के तीन वार, शरीर के कई हिस्से थे अलग
पोस्टमार्टम टीम के मुताबिक, सौरभ की गर्दन धड़ से अलग थी और दोनों हाथ कलाइयों के पास कटे हुए थे। शरीर को ड्रम में समाने के लिए पैरों को पीछे की ओर मोड़ा गया था। वे इतने सख्त हो चुके थे कि उन्हें सीधा नहीं किया गया।
टीम ने बताया कि सौरभ के दिल पर चाकू के तीन वार किए गए थे। घाव दिल के भीतर तक पहुंचे थे और अंग क्षतिग्रस्त हो गया था। घावों की गहराई देखकर ऐसा प्रतीत होता था कि वार काफी जोर से किए गए थे।
चिकित्सीय टीम के सदस्यों के अनुसार, पोस्टमार्टम करीब डेढ़ घंटे तक चला था। वर्षों से इस काम में लगे होने के बावजूद सौरभ के शव की स्थिति ने उन्हें मानसिक रूप से प्रभावित किया। टीम के सदस्यों ने बताया कि उस समय कई दिनों तक वारदात की तस्वीरें उनके जेहन में घूमती रहीं।
54 दिन में दाखिल की गई थी चार्जशीट
सौरभ राजपूत हत्याकांड की विवेचना तत्कालीन ब्रह्मपुरी इंस्पेक्टर रमाकांत पचौरी ने की थी। पचौरी वर्तमान में क्राइम ब्रांच में कार्यरत हैं। उन्होंने बताया कि यह मामला देशभर में चर्चित हुआ और आज भी लोग इसे नीले ड्रम हत्याकांड के नाम से याद करते हैं।
रमाकांत पचौरी के मुताबिक, तत्कालीन एसएसपी विपिन ताडा ने 45 दिन के भीतर चार्जशीट दाखिल करने के निर्देश दिए थे। विवेचना के दौरान गवाहों के बयान दर्ज किए गए और साक्ष्य जुटाए गए। उन्होंने बताया कि इन प्रक्रियाओं को पूरा करने के बाद 54 दिन के भीतर अदालत में चार्जशीट दाखिल कर दी गई थी। पचौरी ने अदालत के फैसले को सही बताते हुए कहा कि मामले में पुलिस ने साक्ष्यों के आधार पर कार्रवाई की।
ड्रम खरीदने से मनाली जाने तक की कड़ियां जोड़ी गईं
तत्कालीन एसएसपी विपिन ताडा, जो वर्तमान में डीआईजी कानपुर शहर हैं, ने भी इस मामले की जांच को याद किया। उन्होंने बताया कि हत्या से पहले सौरभ को खाने में नशीला पदार्थ मिलाकर दिया गया था। इसके बाद हत्या कर शव के टुकड़े किए गए थे।
ताडा के अनुसार, जांच में ड्रम खरीदने से लेकर वारदात के बाद मनाली जाने तक की कड़ियों को जोड़ने पर ध्यान दिया गया। इस सिलसिले में गवाहों के बयान दर्ज किए गए। मनाली के होटल कर्मचारियों को भी बयान दर्ज कराने के लिए बुलाया गया था। उन्होंने बताया कि जांच की निगरानी उन्होंने स्वयं की थी।
तत्कालीन एसएसपी ने कहा कि उन्हें उम्मीद थी कि मामले में दोषियों को मृत्युदंड की सजा मिलेगी। अदालत के फैसले पर उन्होंने संतोष जताया। सौरभ राजपूत हत्याकांड ने अपनी क्रूरता के कारण पुलिस, चिकित्सीय टीम और आम लोगों पर गहरा प्रभाव छोड़ा। अदालत के फैसले के बाद इस मामले से जुड़े लोगों की यादों में वह वारदात एक बार फिर ताजा हो गई है।