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भैया दूज पर अनकही कहानियां: भाई-बहनों ने एक-दूसरे को दी किड़नी... बचा ली जान, आप भी जानें प्रेम-त्याग की कहानी

Sun, 03 Nov 2024 02:32 PM IST
विमल शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, मुरादाबाद

सार

भैया दूज पर भाई-बहन के रिश्ते की अनमोल कहानियों में प्रेम, त्याग और साथ की अद्भुत मिसालें देखने को मिलती हैं। इन कहानियों में असाधारण एकजुटता और विश्वास की झलक है। वहीं यह रिश्ते की डोर को मजबूत करने का संदेश भी देती हैं। भाई-बहन का यह रिश्ता हर सीमा को लांघते हुए प्रेम और सौहार्द की अनसुनी कहानियों के रूप में हमें प्रेरणा प्रदान करता है। आप भी पढ़ें इन कहानियों को....।
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मुरादाबाद में भैया दूज पर तिलक करती बहन - फोटो : संवाद

भारतीय समाज और संस्कृति में भाई-बहन के रिश्ते का विशेष महत्व है। प्यार, देखभाल और अपनेपन की भावना से भरे खून के इस रिश्ते में मित्रता का भाव भी निहित होता है। भाई-बहन का रिश्ता हर मोड़ पर एक-दूसरे का मददगार बनता है। जीवन में कितनी भी मुश्किलें क्यों न आएं, दोनों का आपसी प्रेम उन्हें एक अटूट बंधन में बांधे रखता है।

भाई-बहन के रिश्ते को और प्रगाढ़ बनाने के लिए कई परंपराएं भी हैं। रक्षाबंधन, भाई दूज जैसे त्योहार इस रिश्ते को मान्यता देने के साथ और मजबूत बनाते हैं। रक्षाबंधन पर जहां बहन अपने भाई की कलाई पर राखी बांधकर उसकी सुरक्षा की कामना करती है और भाई अपनी बहन की रक्षा और खुशी के लिए हर संभव प्रयास करने का वादा करता है।

वहीं भाई दूज पर बहन अपने भाई की लंबी उम्र और सफलता की कामना करते हुए तिलक करती है। यह रीति-रिवाज इस रिश्ते में प्रेम और समर्पण की भावना को और गहरा बनाते हैं। आज के तेजी से बदलते दाैर में भी भाई-बहन का प्यार समय और दूरी की सीमाओं से परे है।

बचपन की शरारतों से लेकर जीवन की बड़ी-बड़ी जिम्मेदारियों तक, भाई-बहन का रिश्ता हर मोड़ पर एक-दूसरे का साथ निभाता है। भाई दूज के इस खास माैके पर आज हम आपके सामने लेकर आएं हैं भाई-बहन के प्यार की गहराई और खूबसूरती को उजागर करतीं कुछ ऐसी सच्ची कहानियां, जो हमें न सिर्फ रिश्तों की अहमियत का एहसास कराती हैं, बल्कि यह भी बताती हैं कि इस दुनिया में कुछ बंधन हमेशा के लिए होते हैं।

यह कहानियां उन भाई-बहनों की हैं, जिन्होंने एक-दूसरे के लिए कुछ असाधारण किया। कुछ कहानियों में त्याग की भावना झलकती है तो किसी में अपनी इच्छाओं को बलिदान करते हुए दूसरे की खुशी चुनने की। यह रिपोर्ट भाई-बहन के उस अमूल्य और गहरे प्रेम की झलक पेश करती है, जो हमारे जीवन में एक अहम भूमिका निभाता है।

यह रिश्ते की ताकत को दर्शाता है और हमें यह एहसास दिलाता है कि समय चाहे जैसा हो, इस दुनिया में कोई ऐसा है जो हमारा साथ हमेशा निभाएगा। भाई-बहन के रिश्ते के कुछ ऐसे भी उदाहरण हैं जो धर्मों की सीमा लांघकर समाज में सांप्रदायिक साैहार्द की मिसाल पेश करते हैं।

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स्मिता सिंह और सचिन कुमार - फोटो : संवाद

किडनी देकर बहन ने भाई को दिया जीवन का उपहार

भाई-बहन के अटूट प्यार की यह कहानी है मुरादाबाद के कटघर निवासी और नगर निगम के टैक्स अधिकारी सचिन कुमार की। सचिन की बड़ी बहन स्मिता सिंह ने अपनी किडनी देकर उनकी जान बचाई। 2011 में सचिन को ब्लड प्रेशर की शिकायत हुई, जो धीरे-धीरे गंभीर होती गई। ए निगेटिव ब्लड ग्रुप दुर्लभ होने के कारण डॉक्टरों ने भी हाथ खड़े कर दिए।

कहा कि बिना किडनी ट्रांसप्लांट के बात नहीं बनेगी। तब 2016 में उनकी पत्नी श्वेता सिंह ने अपनी किडनी देकर पति की जान बचाई। इसके बाद 2022 में सचिन की हालत फिर बिगड़ने लगी। चढ़ाने के लिए ब्लड का इंतजाम नहीं हो पाता था। इंजेक्शन लगाकर डॉक्टरों ने स्थिति को संभालने का प्रयास किया, लेकिन हालत गंभीर होती चली गई।

फिर सचिन को दिल्ली के अपोलो अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। वहां डॉक्टरों ने कहा कि दूसरी किडनी भी बदलनी पड़ेगी। तब सचिन मन ही मन जिंदगी से हार मान चुके थे, लेकिन उनकी बड़ी बहन स्मिता उन्हें देखने अस्पताल पहुंचीं। ब्लड ग्रुप की जांच कराई तो ए निगेटिव ही निकला।

इसके बाद उन्होंने अपने भाई को किडनी देकर मौत के मुंह से निकाल लिया। सचिन ने बताया कि वह अपनी बहन को देवी की तरह मानते हैं। जीवन की उम्मीद छोड़ने के बाद बहन ने संकटमोचक की तरह आकर सारी विपदाएं दूर कर दीं। हालांकि, सचिन की दवाएं उम्र भर चलेंगी, लेकिन अब वह खतरे से बाहर हैं।

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कंचन खन्ना और रणधीर। - फोटो : संवाद

बहन ने पढ़ाकर कामयाब बनाया, अब भाई सहारा

मुरादाबाद के मझोला क्षेत्र में लाइनपार निवासी कंचन खन्ना और बिलारी के ग्वारऊ गांव निवासी रणधीर भले ही सगे भाई-बहन नहीं है, लेकिन उनके बीच अब अटूट रिश्ता है। कंचन ने मुफ्त कोचिंग देकर रणधीर को कामयाब बनाया तो अब वह भाई होने का फर्ज निभाते हुए कंचन का सहारा बन गए हैं।

लाइनपार निवासी कंचन खन्ना जन्म के बाद छह माह में ही दिव्यांग हो गई थीं। तब उनके पिता हरि शंकर लाल ने घर पर ही कोचिंग लगवा दी थी। इसके बाद उन्होंने दसवीं की परीक्षा पास की। फिर एमए भी उत्तीर्ण किया और घर पर ही बच्चों को अंग्रेजी की कोचिंग देने लगीं।

2009 में बिलारी के ग्वारऊ निवासी रणधीर ने नौवीं कक्षा से कंचन खन्ना से कोचिंग लेनी शुरू की थी। आर्थिक रूप से कमजोर रणधीन को कंचन ने फ्री में पढ़ाया। इस दौरान रणधीर और कंचन के भाई आशीष के बीच दोस्ती हो गई। रणधीर भी कंचन को अपनी बहन मानने लगे।

कंचन ने पढ़ा-लिखाकर रणधीर को कामयाब बनाया। वह भी कोचिंग में पढ़ाने लगे। 2019 में कंचन के भाई आशीष का निधन हो गया तो रणधीर भाई का फर्ज निभाते हुए कंचन का सहारा बन गए। शारीरिक रूप से कमजोर कंचन को कहीं जाना होता है तो रणधीर ही लेकर जाते हैं। अब दोनों भाई-बहन बच्चों को कोचिंग दे रहे हैं।

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पारुल गोयल और अंकित अग्रवाल - फोटो : संवाद

भाई की किडनी ने  दिया जीवन

बहनों द्वारा भाइयों के लिए अंगदान की कई घटनाएं आपके जेहन में होंगी, लेकिन यहां एक भाई ने अपनी बहन को किडनी देकर उसकी जान बचाई। हर वर्ष भाई दूज के त्योहार पर बहन की रक्षा करने का वचन देने वाले भाई ने बहन को अपना एक अंग देकर जान बचाने का वचन निभाया।

अमरोहा के गांव ढबारसी की रहने वाली पूर्व प्रधान पारुल गोयल की चार साल पहले तबीयत बहुत खराब हो गई थी। चिकित्सकों ने उनकी किडनी खराब होने की बात कही और किडनी प्रत्यारोपण की सलाह दी। किडनी देने के लिए जब कोई दानदाता सामने नहीं आया तो उनके छोटे भाई अंकित अग्रवाल ने बहन को किडनी देकर उनके प्राणों की रक्षा की।

अब दोनों भाई-बहन स्वस्थ व सुखी जीवन व्यतीत कर रहे हैं। भाई दूज के त्योहार पर भाई के इस सराहनीय कदम की यादें ताजा हो जाती हैं। पारुल गोयल चंदौसी के मोहल्ला खेड़ा की रहने वाली हैं। वह छह भाई-बहनों में तीसरे नंबर की हैं।

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शाहजहां और मुकेश गुप्ता - फोटो : संवाद

शाहजहां के भाई बने मुकेश

अमरोहा के हसनपुर निवासी व्यापारी मुकेश गुप्ता 27 वर्षों से अपनी मुंह बोली मुस्लिम बहन शाहजहां से तिलक लगवाकर भाई दूज मनाते हैं। इस बार भी वह भाई दूज का त्योहार मनाने के लिए काफी उत्सुक हैं। 27 साल पहले की बात है जब हसनपुर के काला शहीद मोहल्ले के रहने वाले अली अहमद सैफी और उनकी पत्नी शाहजहां के बेटे की मौत हो गई थी।

बेटे की मौत के बाद परेशानी से घिरे दंपती की किसी ने मदद नहीं की। ऐसे में हसनपुर कस्बे के ही रहने वाले व्यापारी नेता व भाजपा के पूर्व नगर अध्यक्ष मुकेश गुप्ता ने मदद को हाथ बढ़ाया था। तभी से शाहजहां ने मुकेश गुप्ता को अपना भाई मान लिया और हर साल मुकेश गुप्ता को भाई दूज पर टीका करने लगीं।

दोनों के बीच भाई दूज और रक्षाबंधन का त्योहार मनाने का यह सिलसिला 27 साल से चल रहा है। मुकेश गुप्ता का कहना है कि वो अपनी छोटी बहन शाहजहां को आशीर्वाद देते हैं और जरूरत पड़ने पर वो अपनी बहन और उसके परिवार की मदद भी करते हैं।

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लता कश्यम और निशांत कुमार - फोटो : संवाद

भाई को बनाया आत्मनिर्भर 

अमरोहा के मंडी धनौरा के मोहल्ला गढ़ी निवासी लता कश्यप की कहानी भाई-बहन के रिश्ते की मजबूत डोर की मिसाल है। लता कश्यप जब 12वीं में थी तभी उनके पिता सड़क हादसे में गंभीर रूप से घायल हो गए थे। परिवार में कोई और कमाने वाला नहीं था। लता सबसे बड़ी थीं।

छोटी बहन व एक छोटा भाई निशांत कुमार मां की गोद में था। ऐसी स्थिति में लता ने अपने भाई-बहन को पढ़ाने और परिवार की जिम्मेदारियों को संभालने के लिए ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया। आज निशांत एक इंस्टीट्यूट में प्रवक्ता है, जबकि छोटी बहन अपने वैवाहिक जीवन में सुखी है।

लता चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय से संबद्ध एक कॉलेज में लॉ की प्रोफेसर हैं। अपने छोटे-भाई बहन को आत्मनिर्भर बनाने और उनका घर बसाने के लिए लता ने विवाह नहीं किया। लता का समर्पण और अपने परिवार के प्रति उनका संघर्ष भाई-बहन के अटूट प्यार का बड़ा उदाहरण है।

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