shooter dadi
पहले गांव में टीवी ही कम थे, सिनेमा तो दूर की बात है। रामायण और महाभारत का सीरियल आने लगा तो लोगों का टीवी की तरफ रुझान बढ़ा। बाद में बच्चे बड़े हुए तो घर में टीवी पहुंचा और यहां उन्होंने जरूर फिल्मों के कुछ हिस्से देखे, लेकिन कभी ज्यादा दिलचस्पी नहीं रही। शूटर दादी प्रकाशो तोमर कहती हैं कि गांव की महिलाओं को सिनेमाघर तक जाने की फुर्सत और मौका ही कहां मिलते हैं। अब दौर बदल गया है, लेकिन उनके समय में ऐसी कल्पना भी नहीं करते हैं। दिलचस्प बात यह है कि जिन नायिकाओं ने कभी सिनेमाघर नहीं देखा, अब उनके जीवन पर ही फिल्म का निर्माण शुरू हो चुका है।