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कोरोना का एक साल: अपनों को कंधा तक न दे सके... आंखों में आंसू और बयां किया दर्द, तस्वीरें

Mon, 22 Mar 2021 01:25 PM IST
कपिल kapil न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ
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मेरठ में कोरोना: गमजदा परिजन - फोटो : अमर उजाला
बेबसी... लाचारी... आंखें नम और लब खामोश। अपना दर्द कैसे बयां करें, अल्फाज भी नहीं मिल रहे हैं। कोरोना ने लोगों को ऐसा दर्द दिया है, जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता। ऐसी टीस है, जो जब जिक्र करो उभर आती है। आंखों में पानी बनकर और दिल में दर्द बनकर। कोरोना काल में काफी लोग अपनों से बिछुड़ गए। कई परिवार अपनों को अंतिम कंधा तक नहीं दे पाए। कुछ लोग अन्य बीमारियों का इलाज न मिलने के कारण अपनों के बीच से चले गए। एक साल बीतने के बाद भी लोग कोरोना से मिले जख्मों को भुला नहीं पा रहे हैं। कोरोना का संक्रमण एक बार फिर बढ़ रहा है। काफी हद तक इस पर नियंत्रण हो जाने के बाद लोगों को लगने लगा था कि अब शायद महामारी से मुक्ति मिल जाए, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। अगर हम जागरूक नहीं होंगे तो इसके परिणाम बड़े घातक होंगे। पढ़िए अरीश रिजवी की ये खास रिपोर्ट-
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मिशा - फोटो : अमर उजाला
केस - 1
नवजात की जान नहीं बची, पांच माह बाद मां की मौत की जानकारी मिली 


पूर्वा इम्लियान की रहने वाली मिशा राशिद शिक्षिका हैं। उन्होंने बताया कि कोरोना के कारण मैं मेडिकल में भर्ती थी, उस समय मैं गर्भवती थी। इस बीच मेरी मां की मृत्यु हो गई। हाईरिस्क प्रेग्नेंसी के कारण परिवारवालों ने पांच माह तक उनकी मौत के बारे में नहीं बताया। मां को आखिरी बार देख भी नहीं सकी। बाद में मेरा बेटा भी मृत पैदा हुआ। कोरोना के कारण चिकित्सक भी इलाज करने से बच रहे थे, मुझे लगता है सही इलाज न मिलने के कारण बच्चे की मौत हुई। मेरा हीमोग्लोबिन दो से भी कम रह गया था। कोरोना के कारण इतना गम मिला कि अल्फाजों में बयां नहीं कर सकती। 
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मेरठ में कोरोना से मौत
केस - 2 
15 दिन में खो दिए पति और बेटा 


साबुन गोदाम की रहने वाली मंजू शर्मा के पति राकेश शर्मा और बेटे विभांशु वशिष्ठ को कोरोना महज 15 दिन के भीतर लील गया था। मंजू शर्मा नम आंखों से बताती हैं कि कैसे जीवन चल रहा है, बता नहीं सकती। सिर्फ छोटा बेटा बचा है, लेकिन आर्थिक तौर पर टूट जाने के कारण उसकी भी पढ़ाई छूट गई है। दो कमाने वाले थे, दोनों ही चले गए। भगवान, किसी को भी ऐसा गम न दे। विभांशु भाजपा महानगर कार्यकारिणी सदस्य थे। उनका शव दिल्ली से भी नहीं आ सका था, वहीं अंतिम संस्कार करना पड़ा था। मंजू का दर्द यह भी है कि इस संकट के बावजूद कोई भी उनकी मदद करने के लिए आगे नहीं आया। 

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रफीक अंसारी - फोटो : अमर उजाला
केस - 3 
विधायक के फूफा ने अस्पताल में तड़प-तड़प कर तोड़ा था दम  


कोरोना से इस्लामाबाद के अयूब अंसारी की मौत हुई थी। वह शहर विधायक रफीक अंसारी के फूफा थे। विधायक का आरोप है कि मेडिकल कॉलेज में इलाज में लापरवाही बरती गई थी। उन्होंने तड़प तड़पकर दम तोड़ दिया था। मैं खुद भी मेडिकल कॉलेज गया था, तब वहां अव्यवस्था थी। कोरोना प्रोटोकॉल का कारण अंतिम संस्कार में भी परिवार के चंद लोग ही शामिल हो पाए थे। कोरोना ने ऐसा दर्द दिया है जिसकी भरपाई नहीं की जा सकती है। 
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lockdown meerut,लॉकडाउन मेरठ,corona virus - फोटो : amar ujala
...जब घर में ‘कैद’ होकर रहना पड़ा 

कोरोना में एहतियात जरूरी है। जब मुझे कोरोना हुआ तो घर में एक तरह से ‘कैद’ होकर रहना पड़ा था। लेकिन मैंने पूरी सावधानी बरती थी यही वजह रही कि मेरे अलावा कोई और परिवार वाले कोरोना की चपेट में नहीं आया था। यह कहना है सूर्य नगर के रहने वाले अश्वनी गर्ग का। जो पिछले साल 27 मार्च को कोरोना पॉजिटिव आए थे। यह संक्रमित होने वाले जिले में दूसरे व्यक्ति थे। जब वह क्वारंटीन थे तब उन्हें परिवार के लोग जो खाना देते थे उन प्लेटों को 24 घंटे बाद फिर उठाया जाता था। खुद पोछा लगाते थे। योग करते, प्राणायाम करते थे। अपने कमरे को सैनिटाइज करते थे।
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मेरठ में कोरोना से मौत - फोटो : PTI
किसी को दो बार करना पड़ा अंतिम संस्कार 

कोरोना के कारण मेडिकल कॉलेज में लापरवाही की इंतहा हो गई थी। कोरोना पॉजिटिव दो मरीजों के शव ही बदलकर परिवार वालों को दे दिए गए थे। एक का तो इसी तरह अंतिम संस्कार भी कर दिया गया था, जबकि दूसरे के अंतिम संस्कार के दौरान शव बदले जाने का पता चला तो हड़कंप मच गया था। 
यशपाल (58 वर्ष) कंकरखेड़ा मेरठ के रहने वाले थे और गुरुवचन (84 वर्ष) मोदीनगर हरमुखपुरी के। कोरोना होने के कारण बॉडी पैक शव का यशपाल समझकर सूरजकुंड पर अंतिम संस्कार कर दिया था। गुरुवचन के परिजनों को गलती से यशपाल का शव दे दिया था।

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