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Mother's Day 2019: दादी ने बंदूक थामी तो बदली बालिकाओं की जिंदगी, दुनिया ने माना इनका लोहा

Sun, 12 May 2019 01:42 PM IST
Dimple Sirohi न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बागपत
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shooter dadi
आटा चक्की के निर्माण और एक जमाने में बड़ी मात्रा में गोभी की फसल उगाने वाले बागपत जिले के जौहड़ी गांव की पहचान अब शूटर दादी के नाम से होती है। 21 साल पहले पौत्री को लेकर छप्पर की शूटिंग रेंज में गई चंद्रो तोमर हमेशा के लिए निशानेबाजी की होकर रह गई। पौत्री की पिस्टल से पहला निशाना दस पर लगा, इससे बाद चंद्रो तोमर ने वैटरन श्रेणी में देशभर में आयोजित होने वाली प्रतियोगिताओं में भाग लिया। 
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चंद्रो तोमर ने घर-घर जाकर बालिकाओं को शूटिंग सीखने के लिए प्रेरित किया। इससे लाभ यह हुआ कि बड़ी संख्या में जौहड़ी क्षेत्र की बालिकाएं खेल से जुड़ी। सैकड़ों मेडल जीते और खेल कोटे से नौकरी हासिल कीं।  उनका साथ निभाने के लिए देवरानी प्रकाशो तोमर आगे आई। देवरानी और जेठानी की जोड़ी को खास पहचान मिली। टीवी के कई शो में उनकी कामयाबी की कहानी सुनाई गई। शूटर दादी चंद्रो तोमर और प्रकाशी तोमर की बायोपिक सांड़ की आंख दीपावली पर रिलीज होगी। फिल्म की शूटिंग का अधिकतर हिस्सा गांव में ही फिल्माया गया है। इस फिल्म में दिखाया गया है कि किस तरह चंद्रो तोमर ने परिवार और समाज से संघर्ष कर खुद को आगे बढ़ाया।
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shooter dadi
बता दें कि शामली के गांव मखमूलपुर में शूटर दादी का जन्म एक जनवरी 1932 को हुआ । सोलह साल की उम्र में जौहड़ी के किसान भंवर सिंह से उनकी शादी हो गई । यहां उनका संयुक्त परिवार था। घर के कामकाज और खेती किसानी में उन्होंने पति और परिवार का सहयोग किया। शूटर दादी चंद्रो तोमर का बड़ा बेटा ओमवीर सिंह हैं, वह गाजियाबाद में रियल स्टेट का कार्य करते हैं। दूसरे बेटे विनोद कुमार ईट भट्ठा कारोबारी और किसान हैं। एक बेटी  धर्मवीरी गोयला गांव में ब्याही है। दूसरी बेटी कौशल्या राजस्थान के उदयपुर में शिक्षिका हैं। तीसरी बेटी सविता भी टीचर हैं और वर्तमान समय खेकड़ा में कार्यरत है। पौत्र और पौत्रियों में शेफाली, चिराग, अंकित और पूजा हैं। 

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इस तरह हुई थी शुरूआत, छू लिया आसमान
साल 1998 में जौहड़ी में शूटिंग रेंज की शुरूआत डॉ. राजपाल सिंह ने की। पौत्री शेफाली तोमर को निशानेबाजी सिखाने के लिए चंद्रो तोमर रोज घर से शूटिंग रेंज तक जाती। शेफाली शूटिंग सीखती और चंद्रो तोमर देखती रहती। एक दिन चंद्रो तोमर ने एयर पिस्टल शेफाली से लेकर खुद निशाना लगाया। पहला निशाना दस पर लगा...यहीं से दादी की निशानेबाजी का सफर शुरू हुआ। 1999 तके चंडीगढ़ में आयोजित नेशनल में शूटर दादी ने रजत पदक जीता। शूटर दादी ने राष्ट्रीय स्तर पर वेटरन वर्ग में 50 से अधिक पदक जीतने में कामयाबी हासिल की।
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देवरानी का मिला साथ, मचा दिया धमाल
जौहड़ी की छप्पर वाली शूटिंग रेंज में पहले शूटर दादी चंद्रो तोमर पहुंची, फिर उनके बाद उनकी देवरानी प्रकाशो तोमर ने भी यहां पर शूटिंग सीखना शुरू किया। शूटर दादी की जोड़ी ने देशभर में धमाल मचा दिया। उम्र दराज लोगों के लिए वह प्रेरणा बनीं और युवाओं को हौसला दिया। 
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शूटर दादी चंद्रो तोमर को सम्मानित करते सीएम योगी - फोटो : अमर उजाला
कोच बोले...बालिकाओं का उत्साह बढ़ाया
जौहड़ी में सबसे पहले शूटिंग रेंज खोलने वाले डॉ. राजपाल सिंह कहते हैं कि चंद्रो तोमर वेटरन शूटरों में सबसे पहले आई । उनके आने से बालिकाओं को उत्साह मिला। वह विनम्र स्वभाव और धार्मिक प्रवृत्ति की है।
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शूटर दादी प्रकाशो तोमर
बेटियों के लिए प्रेरणा स्रोत हैं शूटर दादी
जौहड़ी के प्रधान राम कुमार का कहना है कि शूटर दादी बालिकाओं के लिए प्रेरणा हैं। साठ साल की आयु के बाद खुद को असहाय समझने वाले लोगों के लिए वह मिसाल बन गई। गांव की बालिकाओं के लिए रोजगार के दरवाजे खोले हैं।

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शूटर दादी प्रकाशो तोमर
चंद्रो तोमर के बेटे विनोद कुमार की बहू मुनेश देवी का कहना है कि घर में वह हमेशा मार्गदर्शक की तरह रहती हैं, कभी नाराज नहीं होती है। पौत्री शेफाली तोमर कहती हैं कि दादी बच्चों के साथ हमेशा हंसी मजाक करती है, कभी नाराज नहीं होती है।

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शूटर दादी प्रकाशो तोमर
विनोद कुमार का कहना है कि मां ने हमेशा पूरे परिवार को आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। उनका स्वभाव शांत है, वह धार्मिक प्रवृत्ति की है। शुरूआत से ही उनका स्वभाव काम खत्म करने के बाद ही आराम करने का रहा है, यही उनकी जीत की वजह है। 
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दुनिया में चमके जौहड़ी के निशानेबाज
जौहड़ी की ट्रेप शूटर और चंद्रो तोमर की भतीजी सीमा तोमर, वर्षा तोमर, रूबी तोमर ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर धमाल बचाया और कई पदक जीते। गांव की बालिकाओं को खेल के माध्यम से नौकरी भी हासिल हुईं।
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