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Exclusive: आत्मनिर्भर हुईं महिलाएं, सुई-धागे से कर रहीं कमाल, बेरोजगारी को किक लगा रही फुटबॉल

Sun, 13 Nov 2022 04:07 PM IST
Dimple Sirohi वाहिद अली, अमर उजाला, मेरठ
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घर के काम के बाद फुटबॉल बनाती महिलाएं - फोटो : amar ujala
मेरठ शहर से करीब 20 किलोमीटर दूर जॉनी क्षेत्र के सिसौला बुजुर्ग गांव में लोगों ने फुटबॉल बनाने के लिए सुई क्या उठाई, उनकी जिंदगी बदलती चली गई। एक घर से शुरू हुआ काम, अब पूरे गांव में फैल गया और रोजगार का बड़ा जरिया बन गया है। 12 हजार की आबादी वाले गांव में करीब 2500 लोग इस व्यवसाय से जुड़े हैं। हर महीने यहां पर डेढ़ से दो लाख फुटबॉल बनाई जाती हैं, जबकि साल भर में 20 लाख से ज्यादा फुटबाल तैयार हो जाती हैं। ये करीब 15 करोड़ रुपये में बिकती हैं।

गांव के शौर्य स्पोर्ट्स कारखाने के मालिक मुकेश कुमार खुद कारीगर भी हैं। उनका कहना है कि फुटबॉल और वॉलीबॉल दिल्ली, कोलकाता और मेरठ में सप्लाई करते हैं। सरकारी मदद के बिना ही इस काम को कर रहे हैं। पिता चंद्रभान की कोरोना काल में मृत्यु हो गई। अब वह भाई विकास के साथ मिलकर इस काम को कर रहे हैं।
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कारखाने में काम करते कर्मचारी - फोटो : amar ujala
मुकेश कुमार एक से डेढ़ लाख रुपये प्रति माह कमा रहे हैं। गांव निवासी सरवरी तीन बेटियों के साथ फुटबॉल की सिलाई में लगी हैं। सरवरी ने बताया कि उनके शौहर दाऊद मजदूरी करते हैं। इससे परिवार चलाने में परेशानी होती है। सभी महिलाएं फुटबॉल की सिलाई कर रही हैं। 6 से 25 रुपये तक फुटबॉल की सिलाई मिल जाती है। घर के काम के साथ यह काम किया जा रहा है। इससे आर्थिक तौर पर मजबूती मिल रही है।
 
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फुटबॉल सिलते कारीगर - फोटो : amar ujala
बच्चे भी करते हैं मदद 
बृजपाल (45)  ने बताया कि दादा के समय से यही काम कर रहे हैं। 30-35 हजार रुपये महीना कमा लेते हैं। पांच बच्चे पढ़ाई करते, खाली समय में बच्चे भी फुटबॉल बनाते हैं। जालंधर और मेरठ से कच्चा माल आता है। 

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फुटबॉल सिलती कारीगर - फोटो : amar ujala
मेरठ-जालंधर से आता है माल 
बिजेंद्र ने बताया 28 साल से फुटबॉल बनाने का काम कर रहे हैं। बेटे मुकुल भी यही काम कर रहे हैं। मेरठ और जालंधर से माल आता है। 30-40 हजार रुपये महीना कमा लेते हैं। कारीगरी के साथ गांवों में फुटबॉल तैयार कराते हैं। 
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फुटबॉल कारीगर - फोटो : amar ujala
चार दशक पहले शुरू किया काम 
रोहन स्पोर्ट्स के मालिक हरि प्रकाश (63) ने बताया कि 16 साल की उम्र में मेरठ से काम सीखकर आए। यहां आकर 40 साल से ज्यादा समय से फुटबॉल बनाने का काम कर रहे हैं। तब से ही गांव में फुटबॉल बनाने का काम तेजी से बढ़ा, जो आज पूरे गांव वालों के रोजगार का साधन बन चुका है। कोरोना काल में भी काम नहीं रुका, माल स्टॉक किया। रोजगार पूरे गांव को मिलता रहा।
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