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ऑनलाइन किताबों के कारोबार पर ये खास रिपोर्ट, छपाई से लेकर बिक्री तक ऐसे होता है बड़ा खेल

Mon, 24 Aug 2020 06:35 PM IST
कपिल kapil आशुतोष भारद्वाज, अमर उजाला, मेरठ
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फर्जी किताबें - फोटो : अमर उजाला
लॉकडाउन में नकली किताबों के ऑनलाइन कारोबार ने अपनी जड़ें मजबूती से जमा लीं। 15 प्रतिशत लाभ में बिकने वाली किताबों में 35 प्रतिशत की ऑनलाइन छूट दी जा रही है। कागज की खरीद से लेकर छपाई तक 18 प्रतिशत की टैक्स चोरी होती है। इस सबके बीच पूरा पैसा काला धन में बदल जाता है। 
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नकली किताबें - फोटो : अमर उजाला
शहर में 200 के आसपास प्रिंटिंग प्रेस लगी हुई हैं। मेरठ पब्लिशर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष आशु रस्तोगी के अनुसार 28 प्रेस रजिस्टर्ड हैं जो ईमानदारी के साथ काम कर रही हैं। इस आंकड़े पर अगर गौर करें तो 172 प्रेस सभी तरह की टैक्स चोरी कर इस गड़बड़झाले में अहम भूमिका अदा कर रही हैं।
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नकली किताबों का गोदाम - फोटो : अमर उजाला
इस सबके बीच बुक सेलर्स में राहुल कुमार ने बताया कि ऑनलाइन किताबों की बिक्री ने पूरी व्यवस्था को बिगाड़ दिया है। एक किताब पर डिस्ट्रिब्यूटर के पास 15 प्रतिशत का नियमानुसार लाभ होता है। उन्हीं किताबों को अगर ऑनलाइन खरीदा जाए तो 35 प्रतिशत तक छूट दी जाती है। इससे स्वयं ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह नकली किताबों की छपाई से ही संभव हो सकता है। 

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फर्जी किताबों का गोदाम - फोटो : अमर उजाला
इस तरह छपती हैं एनसीईआरटी की किताबें
एनसीईआरटी के पैनल पर प्रिंटिंग प्रेस संचालक का रजिस्ट्रेशन होता है। इसके बाद उसे बैंक गारंटी देनी होती है। अगर एक करोड़ की बैंक गारंटी देता है तो उसे एनसीईआरटी एक करोड़ का कागज भेज देता है। इसके बाद उसे लगभग दो लाख किताब छापने का ऑर्डर मिलता है। ऑर्डर के साथ सीडी भेजी जाती है। प्रिंटिंग प्रेस संचालक पहले प्रूफ भेजता है। स्वीकृति के बाद 45 से 60 दिन में डिलीवरी देनी होती है।
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मौके पर पहुंची पुलिस - फोटो : अमर उजाला
नकली किताब छापने वाले करते हैं ये खेल
नकली किताब छापने वाले इंटरनेट से किताब को डाउनलोड कर लेते हैं। इसके बाद अपनी प्रिंटिंग प्रेस में उसकी प्लेट तैयार की जाती है। बाजार से टेलीकॉलिंग और अन्य माध्यमों से उनके एजेंट ऑर्डर उठाते हैं। इधर, प्रिंटिंग प्रेस संचालक सेटिंग कर कागज खरीदते हैं और 12 प्रतिशत टैक्स कागज पर बचाते हैं। एनसीईआरटी के मानक से नीचे कागज खरीदा जाता है। यहां भी 10 प्रतिशत के आसपास बचत हो जाती है। इसके बाद प्रिंटिंग पर पांच प्रतिशत जीएसटी और एक प्रतिशत टीडीएस बचाया जाता है। ऐसे में सारा मुनाफा पूरी चेन में बांट लिया जाता है।

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