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जातिसूचक शब्द के घोर विरोधी थे चौधरी चरण सिंह, पढ़ें उनके जीवन से जुड़ी ये खास बातें

Sun, 23 Dec 2018 03:32 PM IST
कपिल kapil राजदीप जाखड़, अमर उजाला, मेरठ
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Chaudhary Charan Singh
‘जीना ही जिंदगी समझा और फसाना बन गया कोई, अपनी हस्ती मिटाकर ए-अंजुम, अपनी हस्ती बन गया कोई।’ सुलक्षणा ‘अंजुम’ की ये पंक्तियां किसान मसीहा, स्वाधीनता सेनानी पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह पर पूरी तरह सटीक बैठती हैं। 23 दिसंबर 1902 को किसान परिवार में जन्मे चौधरी साहब इस तरह आकाश के नक्षत्र में दमकेंगे ये शायद किसी को पता नहीं था। ये चौधरी साहब के कर्म व भाग्य की विशेषता थी कि वे एक साधारण किसान रहने के स्थान पर देश के किसानों की आवाज बने।
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Chaudhary Charan Singh
आज देश की राजनीति जातियों के घेरे में सिमट कर रह गई है। जातिगत राजनीति और धर्म संप्रदायों पर आधारित राजनीति ने किसान मजदूर और गांव की कमर तोड़कर रख दी है। चौधरी साहब जातिवाद के घोर विरोधी थे। वे इसके विरोध में किसी भी सीमा तक जा सकते थे। यह उनके सन् 1967 के मुख्यमंत्रित्व काल के समय जारी आदेश से प्रमाणित होता है, जब उन्होंने शासकीय आदेश पारित किया कि ‘जो संस्थाएं किसी जाति विशेष के नाम पर चल रही हैं उनका शासकीय अनुदान बंद कर दिया जाएगा’ नतीजतन इस आदेश के तत्काल बाद ही कॉलेजों के नाम के आगे से जाति सूचक शब्द हटा दिए गए। आज भारतीय राजनीति जोड़तोड़ की नीति पर चल रही है। वे इसके सख्त विरोधी थे।
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उन्होंने अपनी बात कहने में कभी लाग लपेट से काम नहीं लिया। उनकी बढ़ती लोकप्रियता देख उनके विरोधी बुरी तरह घबरा गए थे और उनके खिलाफ जातिवादी होने, कभी अनुसूचित जाति विरोधी होने तो कभी मुसलिम विरोधी होने का आरोप लगाने लगे थे। उन्होंने पीड़ित तबकों और किसानों की भलाई के लिए संघर्ष जारी रखा। उनके इसी संघर्ष का प्रतिफल है कि आज लगभग सभी राजनीतिक दल किसानों, पिछड़ों व दलितों को न केवल साथ लेकर चलने की बात करते हैं बल्कि उनके साथ होने में गर्व महसूस करते हैं।

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Chaudhary Charan Singh
चौधरी साहब ग्राम्य विकास के लिए कुटीर एवं लघु उद्योगों को अत्यंत महत्वपूर्ण मानते थे और अर्थव्यवस्था के विकेंद्रीयकरण की बात करते थे। सन् 1982 में लिखे अपने एक लेख में उन्होंने स्पष्ट रूप से लिखा था ‘गरीबी से बचकर समृद्धि की ओर बढ़ने का एकमात्र मार्ग गांव और खेतों से होकर गुजरता है’ उन्हें गांव किसानों व कमजोर वर्गों से अटूट प्रेम था। इसकी कारण उन्हें दलितों का मसीहा भी कहा गया। जुलाई 1979 में प्रधानमंत्री का पद ग्रहण करने के बाद चौधरी चरण साहब ने कहा था ‘इस देश के राजनेताओं को याद रखना चाहिए कि इससे अधिक देशभक्ति पूर्ण उद्देश्य और नहीं हो सकता कि वे यह सुनिश्चित करें कि कोई भी बच्चा भूखे पेट नहीं सोएगा, किसी भी परिवार को अपने अगले दिन की रोटी की चिंता नहीं होगी।
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चौधरी साहब ने किया था सहकारी खेती का विरोध 
भाजपा नेता एवं पूर्व एमएलसी चौधरी जगत सिंह ने पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह की 116वीं जयंती की पूर्व संध्या पर उनके साथ बिताए गए पलों को अमर उजाला से साझा किया। उन्होंने बताया कि चौधरी साहब देश की राजनीति में न होते तो आज देश में किसान न होते। वे चौधरी साहब ही थे जिन्होंने कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन में लाए गए सहकारी खेती के प्रस्ताव को पुरजोर विरोध किया था। इसके बाद से ही चौधरी साहब की पहचान किसान नेता के रूप में होने लगी थी। आज भी चौधरी साहब किसानों के दिल में बसते हैं।
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दबे-कुचलों की आवाज बने पूर्व प्रधानमंत्री
किसानों के मसीहा चौधरी चरण सिंह ने महात्मा गांधी के 1930 नमक सत्याग्रह आंदोलन के दौरान छह माह का प्रथम कारावास काटा। 1935 में जिला बोर्ड मेरठ के उपाध्यक्ष चुने गए। 1937 में कांग्रेस के टिकट पर मेरठ से विधानसभा पहुंचे। उन्होंने खाद्य डीलरों के शोषण से किसानों को बचाने के लिए कृषि उपज विपणन विधेयक विधानसभा में पेश किया तथा जमींदारों से भूमिहीन कृषकों एवं भूमि सुधार के लिए जमींदारी उन्मूलन भूमि उपयोग बिल तैयार किया। उन्होंने हमेशा सामाजिक एवं राजनैतिक कार्यकर्ताओं को ईमानदारी की सीख दी। गरीबों व दबे कुचलों की आवाज बनने का आह्वान किया। सबसे पहले पिछड़ी जातियों को जोड़कर सशक्त राजनीतिक संगठन बनाया और किसानों को देश की राजनीति में पहचान दिलवाई। - राजपाल सिंह, सपा जिलाध्यक्ष
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किसान की पीड़ा को समझा और समाधान भी कर दिखाया
किसान घर में जन्मे और ताउम्र किसानों की लड़ाई लड़ते रहे। युवाओं को राजनीति में आगे बढ़ाया। किसान-मजदूरों के दिल में पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय चौधरी चरण सिंह की अमिट यादें हैं। उनके साथ लंबे समय तक जुड़े रहे लोगों के पास कभी न खत्म होने वाली बातें। ईमानदारी उनकी पहचान रही, यही वजह है कि जिस दिन उनका निधन हुआ तब उनके खाते में सिर्फ 470 रुपये थे।

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पूर्व विधायक डॉ. महक सिंह बताते हैं कि चौधरी साहब बहुत ही गंभीर विचारशील थे। वह अत्यंत ईमानदार थे और किसानों और कार्यकर्ताओं को साथ लेकर चलते थे। कार्यकर्ताओं को परिवार की तरह मानते थे। उन्होंने युवाओं को राजनीति में आगे बढ़ाया। प्रो. बलजीत सिंह आर्य ने कहते हैं कि चौधरी चरण सिंह राजनीतिज्ञ के साथ-साथ समाज सुधारक भी थे और भ्रष्टाचार के खिलाफ थे। आर्य समाज का उनके जीवन पर गहरा असर था। अपने घर में रोजाना यज्ञ भी करते थे।
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डॉ. ओमवीर सिंह तोमर कहते हैं कि गरीब की आवाज बनकर खड़े होते थे। बागपत का माया त्यागी कांड इसका ज्वलंत उदाहरण था। छपरौली से पांच बार विधायक रहे नरेंद्र सिंह बताते हैं कि किसान के हित में चौधरी चरण सिंह जैसा बजट किसी ने नहीं दिया। वह सच्चे किसान नेता थे। इमरजेंसी के बाद पांच जनवरी 1977 को छपरौली में जनसभा हुई। देश के विभिन्न हिस्सों से दो लाख किसान पहुंच गए। भाषण के बीच में ही बड़े चौधरी की आंखों से पानी बहने लगा। वित्त मंत्री रहते हुए बड़े चौधरी ने गांव के लिए 48 प्रतिशत बजट दिया था। उन्होंने 19 मार्च 1981 को तत्कालीन प्रधानमंत्री को पत्र भेजकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद हाईकोर्ट की बेंच के लिए चिट्ठी लिखी थी।

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