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आशिया की दर्दभरी कहानी: जुबां से बयां की दास्तां, सुनकर भर आईं आंखें, मासूम पोती-पोते के लिए चलाती हैं ठेला

Fri, 17 Feb 2023 02:55 AM IST
कपिल kapil अमर उजाला ब्यूरो, मेरठ
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आशिया। - फोटो : अमर उजाला
जिंदगी में इतना दर्द मिला पर जीने की हिम्मत नहीं छोड़ी। पहले पति को खोया फिर 24 साल का इकलौता बेटा। वक्त इतना बुरा कि जिंदगी काली हो गई। जीना नहीं चाहती थी मगर सूनी आंखों के सामने दो पोती व एक पोता थे। 

मन ही मन खुद को काफी समझाया कि बेटा नहीं तो क्या हुआ, उसके बच्चे तो हैं। मासूमों को हंसता देख जन्नत में पति व बेटा खुश होंगे। इसके बाद सड़क पर कबाड़ बीना और एक-एक पैसा जमा किया। अब रिक्शा ले लिया है, जिस पर सामान ढोती हूं और उसे चलाने की शक्ति मासूमों की हंसती आंखों के सामने रखकर आती है। यह कहानी है मेरठ के रजवन में रहने वाली आशिया की।
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ठेला चलाती आशिया। - फोटो : अमर उजाला
तेज रफ्तार में माल वाहक रिक्शा दौड़ाने वाली रजवन निवासी आशिया ने बताया कि जब वह गर्भवती थी, तब उसके पति का निधन हो गया। पहले तो परिवार के सदस्यों ने ढांढ़स बंधकर रोटी खिलाने का वायदा किया मगर कुछ समय बाद मुंह फेर लिया। बेटा ग्यासी को जन्म दिया मगर रोटी के लाले पड़ गए। अब कोई न ढांढ़स बंधाने वाला था और न रोटी खिलाने वाला। एक रुपया भी नहीं था, जिससे कोई काम करती। 
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आशिया। - फोटो : अमर उजाला
बताया कि मजबूरन बोरी उठाकर सड़क पर कबाड़ बीनना शुरू कर दिया, जिसे बेचकर रोटी का साधन किया। दिनभर घूमने से शरीर जवाब देने लगा तो कबाड़ी की दुकान पर काम करना शुरू कर दिया। बेटा बड़ा हुआ और मजदूरी करने लगा। 

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आशिया। - फोटो : अमर उजाला
इसके बाद बेटे की शादी कर दी, जिससे दो पोती और एक पोता हुआ। परिवार में खुशी आने लगी। सोचा अब जिंदगी आराम से कट जाएगी मगर किस्मत को यह गवारा नहीं था। अचानक बेटे की मौत हो गई और कुछ दिन बाद उसकी पत्नी मासूम बच्चों को छोड़कर चली गई। फिर घनघोर अंधेरे में जिंदगी उसी दोराहा पर पहुंच गई। 
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फाइल फोटो। - फोटो : अमर उजाला
अब जिंदगी नहीं जीना चाहती थी मगर बेटे की निशानी बतौर दो नातिन और एक नाती आंखों के सामने हैं, जिनके लिए जीना है। इसके बाद फिर कबाड़ की दुकान पर काम किया और एक-एक पैसा जोड़कर माल वाहक रिक्शा खरीद दिया। अब माल ढोकर बच्चों की परवरिश कर रही हूं। 
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फाइल फोटो। - फोटो : अमर उजाला
बताया कि रोजाना तीन सौ से चार सौ रुपये तक आ जाते हैं। बच्चे छोटे हैं, इसलिए शाम ढलने से पहले घर पहुंच जाती हूं। आशिया ने बताया कि भले ही उम्रदराज हो गई हूं मगर अपने मासूम नाती-नातिन के चेहरे पर मुस्कान लाने के लिए हिम्मत और रफ्तार से माल ढोती हूं।
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