जिंदगी में इतना दर्द मिला पर जीने की हिम्मत नहीं छोड़ी। पहले पति को खोया फिर 24 साल का इकलौता बेटा। वक्त इतना बुरा कि जिंदगी काली हो गई। जीना नहीं चाहती थी मगर सूनी आंखों के सामने दो पोती व एक पोता थे।
मन ही मन खुद को काफी समझाया कि बेटा नहीं तो क्या हुआ, उसके बच्चे तो हैं। मासूमों को हंसता देख जन्नत में पति व बेटा खुश होंगे। इसके बाद सड़क पर कबाड़ बीना और एक-एक पैसा जमा किया। अब रिक्शा ले लिया है, जिस पर सामान ढोती हूं और उसे चलाने की शक्ति मासूमों की हंसती आंखों के सामने रखकर आती है। यह कहानी है मेरठ के रजवन में रहने वाली आशिया की।