धार्मिक पर्यटन की दृष्टि से गढ़मुक्तेश्वर को कभी देखा ही नहीं गया। यही वजह है कि यहां दुर्लभ शिवलिंग के दर्शन के लिए भी जर्जर सीढ़ियों से गुजरना पड़ता है। जहां गंगा की इतनी महिमा हो, वहां गंगा मंदिर की उपेक्षा बहुत सालती है। करीब 80 सीढ़ियां चढ़कर इस मंदिर में पहुंचते हैं। जहां मां गंगा मूर्त रूप में विराजमान हैं। इसी मंदिर की धरोहर विलक्षण शिवलिंग है।
इसमें स्वतः एक दाना अंकुरित होता है जो मनुष्याकृति में बदल जाता है। कई आकृतियां इसमें देखी जा सकती हैं। यह अपने आप में अनूठा है। मंदिर में कई बार चोरी होने के कारण पुरोहित ने इसे अपने घर में सहेज कर रखा है। मंदिर में ब्रह्मा की चार मुखी मूरत भी स्थापित है।
यह इस शहर का विख्यात मंदिर है। पर्यटन विभाग का बोर्ड गिरा पड़ा है। सीढ़ियां जीर्ण-शीर्ण हैं। सीढ़ियों में विशेष प्रकार का पत्थर लगा है। इनमें पत्थर मारे जाने पर पानी जैसी आवाज सुनाई देती है। मंदिर में मां गंगा और ब्रह्मा जी की मूर्तियां सुशोभित हैं। शिव परिवार भी विराजमान है।
पुरोहित संतोष कौशिक ने बताया कि मंदिर में कई बार चोरी हो चुकी है। इसलिए 1970 के पहले से इसे घर में ही रखा है। शिवलिंग में स्वयं दाना अंकुरित होकर मनुष्याकृति बन जाता है। यह अनमोल है। मंदिर करीब 500 वर्ष प्राचीन है। हमारे पुरखों ने इसका निर्माण कराया था।
1885 में अंग्रेज कलेक्टर एसएम राहट व जॉजफ हैनरी ने इस मंदिर तक पहुंचने के लिए सीढ़ियां बनवाई। मंदिर की कोई कमेटी नहीं है। पहले कार्तिक मेले से प्राप्त आय का आठवां हिस्सा मंदिर की देखरेख में खर्च किया जाता था पर 1960 के बाद से बंद हो गया। गढ़मुक्तेश्वर विकास से अछूता रहा है। काफी समय से यहां श्रद्धालु आना भी कम हो गए। मेले में आने वाले भक्तों को भी बाहर से निकाल दिया जाता है।
कहां जाता है शिवलिंग पर चढ़ा पानी
गढ़ से करीब छह किमी दूर कल्याणेश्वर महादेव का मंदिर है। गर्भगृह की संरचना ऐसी है कि झरोखे से सूरज की रोशनी सीधे महादेव पर पड़ती थी। वर्तमान में यह झरोखा बंद है। कल्याणेश्वर महादेव का विशाल शिवलिंग है जिस पर जलधारा से निशान पड़ गया है। यह मंदिर भी परशुराम द्वारा स्थापित कहा जाता है।