जो जहां था वहीं निढाल हो गया
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मौत को करीब देख मुशर्रफ के सामने अपने मासूम बच्चों का चेहरा, परिवार की उम्मीद और टूटते सपने सब एक साथ खडे़ थे। ऐसे में उसे अपने दोस्त से ही कुछ आशा थी, लेकिन लाचार मोनू भी ऐसे क्षणों में कुछ नहीं कर सका।
मुशर्रफ फफक कर रो रहा था और मोनू से कह रहा था कि वह उसके परिवार का हर हाल में ख्याल रखे। बात करते-करते ही मुशर्रफ की सांसें थम गईं। शोभित ने दोस्त को हिम्मत बंधाई, लेकिन सब नाकाम। 'अच्छा भैया! बचने को कोई रास्ता नहीं है मोनू, घर में सब को मेरा सलाम कहना, मेरे बच्चों का ख्याल रखना.... कहते-कहते मुशर्रफ की सांसे सुस्त पड़ती गईं। एक दोस्त दूसरे दोस्त से हमेशा के लिए अलविदा कह चुका था।