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अमर उजाला अभियानः फेल हो रहे सरकारी दावे, कहीं एक स्ट्रेचर पर तीन मरीज, कहीं दवाओं का टोटा

Thu, 10 Jan 2019 04:19 PM IST
दुष्यंत शर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ
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मेडिकल कॉलेज
उत्तर प्रदेश सरकार स्वास्थ्य सुविधाओं पर करोड़ों खर्च करने के दावे करती है लेकिन ये सुविधाएं व संसाधन आम आदमी तक आसानी से पहुंच रहे हैं या नहीं इस पर हुकूमत का ध्यान शायद ही जाता है। यूपी में सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था कितनी मजबूत है इसे देखने के लिए अमर उजाला की टीम ने मेरठ के जिला अस्पताल और मेडिकल कॉलेज का रुख किया। यहां पहुंचने पर जो हकीकत सामने आई वह कुछ और ही थी। देखें क्या है हाल:-
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मेडिकल कॉलेज
मेरठ जिला अस्पताल और मेडिकल कॉलेज में व्यवस्थाओं का बुरा हाल है। मेडिकल कॉलेज में स्ट्रेचर न होने से मरीज परेशान रहते हैं। कई बार तीन मरीजों को एक ही स्ट्रेचर नसीब होता है। स्ट्रेचर लेना दवा और पर्चा बनवाने से भी ज्यादा मुश्किल भरा है। इसके लिए अपना आईडी कार्ड या आधार कार्ड जमा करना पड़ता है। 

 
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मेडिकल कॉलेज
इसके अलावा बायो मेडिकल वेस्ट का निस्तारण भी नहीं हो पा रहा है। दवाइयां और इस्तेमाल किया हुआ बायो मेडिकल वेस्ट इधर-उधर पड़ा रहता है। इस संबंध में मेडिकल कॉलेज के सीएमएस का कहना है कि स्ट्रेचर गुम हो जाते हैं, इसलिए पहचान पत्र लेना पड़ता है। बायो मेडिकल वेस्ट के लिए लोगों को जागरूक किया जा रहा है कि वह इधर-उधर न फेंकें।

 

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मेडिकल कॉलेज
चिकित्सक चला रहे हीटर, मरीज ठिठुर रहे : जिला अस्पताल में मरीज ठिठुर रहे हैं, उनके लिए एक पतला सा कंबल है। ठंड से बचने के लिए वह घर से रजाई लाने को मजबूर हैं। दूसरी तरफ चिकित्सक ठंड को भगाने के लिए दिन में भी हीटर चला रहे हैं। जिला अस्पताल के एसआईसी डॉ. पीके बंसल का कहना है कि मरीजों के लिए कंबल पर्याप्त हैं। वह ठंड से बचने के लिए जितने चाहें कंबल ले सकते हैं।

 
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Sn Medical College
डेढ़ माह से नहीं बना मृत्यु प्रमाण-पत्र 

मेडिकल कॉलेज में एक मरीज की मृत्यु 25 नवंबर 2018 को हुई थी। उनके भाई अनिल कुमार मृत्यु प्रमाणपत्र बनवाने के लिए मेडिकल कॉलेज के चक्कर काट रहे हैं। लेकिन उन्हें हर बार टरका दिया जा रहा है। उनका आरोप है कि वह जब भी आते हैं, उन्हें एक सप्ताह का समय दे दिया जाता है।
 
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मेडिकल कॉलेज
भटकते रहते हैं मरीज

दोनों ही अस्पतालों में मरीज दवाओं के लिए भटकते रहते हैं। जिला अस्पताल में तो दवा काउंटर पर सारी दवाइयां मिलती भी नहीं हैं। उन्हें जन औषधि केंद्र से दवाई लेने केलिए कहा जाता है। इस पर कई बार मरीज हंगामा भी कर चुके हैं। उनका कहना होता है कि अगर पैसे देकर ही दवाइयां खरीदनी हैं तो फिर जिला अस्पताल या मेडिकल कॉलेज ही क्यों, वह निजी चिकित्सक को दिखा लेंगे। 

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