बशीर बद्र का हआ निधन।
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जब दंगों की आग में जल गया शायर का आशियाना
वर्ष 1987 के सांप्रदायिक दंगों ने बशीर बद्र की जिंदगी बदल दी। शास्त्री नगर स्थित उनका घर हिंसा की आग में जल गया। उस आग में सिर्फ दीवारें नहीं जलीं, बल्कि उनकी पांडुलिपियां, खत, नज्में और वर्षों की यादें भी राख हो गईं। उस दर्द ने उनकी शायरी को नया मोड़ दिया। उसी दौर में उनके दिल से निकला-
'लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में,
तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में।'
यह शेर सिर्फ एक कविता नहीं, बल्कि उस दौर की टूटती इंसानियत की चीख बन गया।