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स्मृति: मेरठ कॉलेज में डेढ़ दशक तक उर्दू के प्रोफेसर रहे बशीर बद्र, उर्दू-प्रेमियों की अनोखी पाठशाला था घर

Thu, 28 May 2026 09:33 PM IST
Dimple Sirohi राजन शर्मा, अमर उजाला, मेरठ

सार

Bashir Badr Passes Away: मशहूर शायर बशीर बद्र मेरठ कॉलेज में करीब डेढ़ दशक तक उर्दू के प्रोफेसर रहे। दंगों में घर जलने के बाद भी उन्होंने मोहब्बत और इंसानियत की शायरी को जिंदा रखा।

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बशीर बद्र - फोटो : सोशल मीडिया
मशहूर शायर बशीर बद्र का 91 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। बेटे तय्यब बद्र ने बताया कि वे लंबे समय से डिमेंशिया से पीड़ित थे। उनके निधन की खबर से साहित्य और अदब जगत में शोक की लहर है।  गंगा-जमुनी तहजीब की खुशबू में रचा-बसा मेरठ सिर्फ क्रांति और इतिहास का शहर नहीं रहा, बल्कि यह शायरी और अदब की ऐसी सरजमीं भी बना जहां बशीर बद्र जैसे अजीम शायर ने अपनी पहचान गढ़ी। उन्होंने इसी शहर में रहकर आधुनिक उर्दू गजल को नई आवाज, नई रवानी और नया एहसास दिया।

आज भले ही बशीर बद्र इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन मेरठ की फिजाओं, गलियों, मुशायरों और लोगों की जुबान पर उनकी शायरी अब भी जिंदा है। शहर ने उन्हें कभी भुलाया नहीं।

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बशीर बद्र मेरठ के रहने वाले थे। उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से पोस्ट ग्रेजुएशन किया था। उनके नाम आज भी शैक्षणिक उत्कृष्टता का रिकॉर्ड दर्ज है। उन्हें उस दौर में प्रतिष्ठित पुरस्कार और छात्रवृत्तियां मिली थीं, जब इतनी राशि किसी युवा शिक्षक के वेतन से भी अधिक मानी जाती थी।
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डॉ. हरिओम पंवार - फोटो : अमर उजाला
मेरठ कॉलेज में सिर्फ पढ़ाते नहीं थे, अदब जीना सिखाते थे
डॉ. बशीर बद्र करीब डेढ़ दशक तक मेरठ कॉलेज में उर्दू के प्रोफेसर रहे। उनका अध्यापन केवल किताबों और पाठ्यक्रम तक सीमित नहीं था। वह अपने विद्यार्थियों को उर्दू अदब की रूह से रूबरू कराते थे। 

मेरठ कॉलेज के पूर्व प्रोफेसर डॉ. हरिओम पंवार बताते हैं कि बद्र साहब की कक्षा एक अलग दुनिया होती थी। वहां सिर्फ भाषा नहीं, बल्कि एहसास, फिक्र और इंसानियत भी पढ़ाई जाती थी।

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बशीर बद्र का हआ निधन। - फोटो : अमर उजाला
जब दंगों की आग में जल गया शायर का आशियाना
वर्ष 1987 के सांप्रदायिक दंगों ने बशीर बद्र की जिंदगी बदल दी। शास्त्री नगर स्थित उनका घर हिंसा की आग में जल गया। उस आग में सिर्फ दीवारें नहीं जलीं, बल्कि उनकी पांडुलिपियां, खत, नज्में और वर्षों की यादें भी राख हो गईं। उस दर्द ने उनकी शायरी को नया मोड़ दिया। उसी दौर में उनके दिल से निकला-
'लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में,
तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में।'
यह शेर सिर्फ एक कविता नहीं, बल्कि उस दौर की टूटती इंसानियत की चीख बन गया।

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बशीर बद्र - फोटो : kavya
मेरठ छोड़ा, मगर शहर दिल से नहीं निकला
दंगों के बाद बशीर बद्र ने मेरठ छोड़कर भोपाल में नया ठिकाना बना लिया, लेकिन उन्होंने खुद कहा था कि मेरठ उनकी रगों में बसा हुआ है। शहर की गलियां, पुराने चौक, मुशायरों की रातें और लोगों की मोहब्बत उनके दिल में हमेशा जिंदा रही। यही वजह है कि आज भी मेरठ में उनकी शायरी की महक महसूस की जाती है।
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बशीर बद्र - फोटो : kavya
उर्दू प्रेमियों की अनोखी पाठशाला था उनका घर
व्यंग्यकार गिरिराज शरण गुप्त बताते हैं कि बशीर बद्र का घर उर्दू प्रेमियों के लिए किसी पाठशाला से कम नहीं था। शाम ढलते ही वहां चाय, शायरी और अदब की महफिल सजती थी। युवा शायर उनसे सीखने आते थे और वह हर नए शेर को बच्चे की तरह संवारने की बात करते थे।
उनका कहना था-
शेर भी बच्चे की मानिंद होते हैं, इन्हें पालना पड़ता है। 
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बशीर बद्र - फोटो : kavya
अल्फाज की लौ कभी नहीं बुझती
बशीर बद्र की जिंदगी इस बात की मिसाल रही कि नफरत आग लगा सकती है, लेकिन मोहब्बत और अल्फाज की रोशनी कभी खत्म नहीं कर सकती। आज उनका शरीर भले हमारे बीच नहीं है, लेकिन उनकी गजलें, उनके शेर और इंसानियत का उनका पैगाम हमेशा जिंदा रहेगा।
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