'लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में...'
यह सिर्फ एक शेर नहीं, बल्कि इंसानियत के दर्द की वह आवाज थी जिसे मशहूर शायर बशीर बद्र ने अपनी जिंदगी के सबसे मुश्किल दौर में महसूस किया और फिर शब्दों में ढाल दिया।
उर्दू अदब की दुनिया का यह बड़ा नाम अब हमारे बीच नहीं रहा, लेकिन मोहब्बत, भाईचारे और इंसानियत का उनका पैगाम हमेशा जिंदा रहेगा। दंगों में अपना घर खोने के बाद भी उन्होंने नफरत नहीं, बल्कि अमन और इंसानियत की बात की।