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पढ़िए- 33 साल में कितना बदल गया मेरठ, स्थापना दिवस पर पेश है अमर उजाला की खास रिपोर्ट

Thu, 12 Dec 2019 02:51 AM IST
कपिल kapil अरीश रिज़वी, अमर उजाला, मेरठ
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तैयार हुई नई बिल्डिंग - फोटो : अमर उजाला
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साल 1986, एक वक्त वो था। गंभीर बीमारी हो जाए तो इलाज के लिए दिल्ली की दौड़ लगानी पड़ती थी। गिनती के अस्पताल थे और अंगुलियों पर गिने जा सकने वाले अच्छे चिकित्सक। 2019 आते-आते बहुत कुछ बदला है। मेरठ अब मेडिकल हब बन गया है। सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल हैं। एक से बढ़कर एक चिकित्सक। चिकित्सा और चिकित्सकों की विदेशों तक धूम मची है। ई-हॉस्पिटल से सरकारी अस्पतालों में भी घर बैठे अपॉइंटमेंट ले सकते हैं। घर से फोन कर एंबुलेंस बुला सकते हैं। देशभर से मरीज यहां इलाज कराने आते हैं। 

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33 साल पहले करीब 300 चिकित्सक थे, जिनमें से 250 इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) मेरठ शाखा में पंजीकृत थे, अब इनकी तादाद 2000 के पार है। 1200 से ज्यादा तो आईएमए में पंजीकृत हैं। अस्पतालों-नर्सिंग होम की संख्या 20-25 थी। आईसीयू, वेंटिलेटर, एंबुलेंस नहीं थी। ये नहीं, फेफड़ों, दिल और गुर्दे की जो जांचें और इलाज उस वक्त नहीं था, अब टॉप पर है। अब मरीजों को दिल्ली भेजने की जरूरत नहीं है। दिल्ली तो दिल्ली, चिकित्सकों और चिकित्सालयों में ऐसी तकनीकें हैं जो विश्वस्तर पर कदमताल मिला रही हैं। अब पंजीकृत अस्पताल-नर्सिंग होम की संख्या 243 है।  

तब से मुकाबला करें तो सरकारी सुविधाएं भी आसमान पर हैं। मेडिकल में 150 करोड़ की सुपर स्पेशियलिटी बिल्डिंग बनकर तैयार है। ट्रॉमा सेंटर बन गया है। आधुनिक माइक्रोबायोलॉजी लैब है। स्वाइन फ्लू, टीबी, डेंगू, चिकनगुनिया के मरीजों की जांच के लिए सैंपल दिल्ली, लखनऊ या आगरा नहीं भेजने पड़ते। सिलिंडर केबजाय लिक्विड ऑक्सीजन की सुविधा है। जिला अस्पताल में बुजुर्गों के लिए अलग से जिरियाट्रिक वार्ड है। महिला जिला अस्पताल में छह मंजिला नई बिल्डिंग में आधुनिक स्वास्थ्य सुविधाएं हैं। कंगारू केयर और बच्चों की नर्सरी है। स्वास्थ्य विभाग में पहले दो सीएचसी और 30 पीएचसी थी। अब 12 सीएचसी, 31 पीएचसी और 26 अर्बन हेल्थ सेंटर हैं। देहात के मरीज इलाज के लिए शहर आने के मोहताज नहीं हैं।

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मेरठ के डॉक्टरों की विदेशों तक धूम 

मेरठ के डॉक्टरों की धूम विदेशों तक है। एलएलआरएम मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस करने वाले चिकित्सक विदेशों में भी सफल प्रैक्टिस कर रहे हैं, ऐसे चिकित्सकों की संख्या भी कम नहीं है। विदेशों में प्रैक्टिस करने वाले चिकित्सकों की बात करें तो डॉ. रिम्मी 1988 बैच की हैं। लंदन में प्रैक्टिस करती हैं। लंदन में ही 1988 बैच के डॉ. मनोज श्रीवास्तव चिकित्सा करते हैं। 1989 बैच के चिकित्सक डॉ. मोहित सिंह नेगी अमेरिका में चिकित्सा करते हैं। 1990 बैच की चिकित्सक डॉ. दीप्ति मलिक अमेरिका के टाउन पेंसिल्वेनिया में हैं। वह इंफेक्शन डिसीज एक्सपर्ट हैं। इसी बैच की दुबई में गायनी की चिकित्सक हैं डॉ. अंशु जैन। 1991 बैच की डॉ. नीतू मोहन अमेरिका में मेडिसिन इंफार्मेटिक हैं। इनका काम मरीज और बीमारी से जुड़ी जानकारी पोर्टल पर लाना है। वह टेली मेडिसिन को बढ़ावा दे रही हैं। 1990 बैच के ही डॉ. वी विवेक अमेरिका में प्राइमरी केयर चिकित्सक हैं। विदेशी में प्रैक्टिस कर रहे यहां के चिकित्सकों की फेहरिस्त काफी लंबी है। 1992 बैच के सिंगापुर में डॉ. राशि अग्रवाल हैं। कोलंबिया में डॉ. मेधा गर्ग रेडियोलॉजी की एसोसिएट प्रोफेसर हैं। यूएसए में डॉ. रुचि श्रेष्ठा यूनिवर्सिटी ऑफ सेंट पीटर्स बर्ग में रेडियोलॉजी विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। डॉ. रेसु बिक्रम इसी यूनिवर्सिटी में चीफ इनोवेशन ऑफिसर हैं। इनके अलावा अमेरिका में डॉ. शक्ति श्रीवास्तव, डॉ. सोनिया और डॉ. श्वेता हैं। 

तब तो अस्पताल में जेनरेटर भी नहीं थे  
वरिष्ठ यूरोलॉजिस्ट डॉ. बीपी सिंघल कहते हैं, मैं 1978 से आईएमए का सदस्य हूं। मैं इंग्लैंड से मेरठ आया था। 33 साल पहले तो चंद अस्पताल थे, उनमें भी जेनरेटर तक की व्यवस्था नहीं होती थी। संसाधन बेहद कम थे। दिल्ली में भी चिकित्सा व्यवस्था इतनी मजबूत नहीं थी। हालांकि हमारी कोशिश रहती थी कि मरीज को बेहतर इलाज दे सकें। अब चिकित्सा क्षेत्र में नए आयाम कायम हो रहे हैं।
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गंभीर मरीज को देखने घर पर जाया करते थे  

वरिष्ठ फिजिशियन डॉ. राकेश ऐरन ने बताया कि मैं 1977 से आईएमए का सदस्य हूं। 1987 में दंगे और कर्फ्यू के दौरान अमर उजाला ने शांति बनाए रखने के लिए हमारे भी कोट्स छापे थे। जहां तक मेडिकल क्षेत्र की बात है तो तब और अब में काफी फर्क आ गया है। तब न तो शुगर और हार्ट की इस तरह की इफेक्टिव दवाइयां थीं और न ही ऐसी तकनीकें और मशीनें। गंभीर मरीजों को देखने के लिए चिकित्सक घर पर ही जाया करते थे। डायलिसिस भी मरीज की घर पर ही होती थी।  

चंद अस्पताल थे और गिनती के चिकित्सक  
वरिष्ठ फिजिशियन डॉ. वीके बिंद्रा ने बताया कि मैं 1985 से आईएमए का सदस्य हूं। 33 साल पहले की बात करें तो उस समय चंद अच्छे अस्पताल थे और गिनती के बेहतर चिकित्सक। भोपाल नर्सिंग होम, हीरालाल, राजाराम और चौरसिया अस्पताल आदि ही नामी अस्पताल थे। इनमें भी अत्याधुनिक सुविधाएं नहीं थीं। धीरे-धीरे टेक्नोलॉजी बढ़ी, नई-नई सुविधाएं आईं। मेडिकल क्षेत्र की बेहतरी के लिए विदेश जाकर भी चिकित्सकों ने प्रशिक्षण प्राप्त किया।

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