फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

आखिरी सफर के ड्राइवर: कोविड पॉजिटिव शवों को ले जाने वाले चालकों की आपबीती, बोले- गाली खाते, फिर भी...

Wed, 21 Apr 2021 06:56 PM IST
प्रभापुंज मिश्रा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
विज्ञापन
1 of 5
छोटू, अमित, राजोल - फोटो : amar ujala
एक तरफ जब हम कोरोना संक्रमित के पास फटकना भी नहीं चाहते, ऐसे में शव वाहन चलाने वाले अपनी जान जोखिम में डालकर दिन रात शवों का अंतिम संस्कार कराने में जुटे हैं। हैलट छोड़कर पूरे शहर की जिम्मेदारी महज तीन शव वाहनों पर है। इनके चालकों को खाने तक का समय नहीं मिलता। कई दिन तक घर नहीं जाते। वीडियो कॉल से ही पत्नी और बच्चों की खबर ले लेते हैं। इसके बाद भी इनका कई बार मृतकों के परिजनों की ओर से तिरस्कार किया जाता है। गुस्से में भला बुरा कह देते हैं।
 
 
Trending Videos
विज्ञापन

2 of 5
अंतिम संस्कार के लिए रखे शव - फोटो : amar ujala
उन्नाव निवासी छोटू इन्हीं में से एक शव वाहन चलाते हैं। बताते हैं कि कभी-कभी खाना खाने तक का समय नहीं मिलता। शहर भर में कोरोना पॉजिटिव शवों को उठाने की जिम्मेदारी केवल तीन शव वाहनों पर है। हैलट के लिए जरूर अलग वाहन हैं। कई बार मृतक के घर पहुंचने में देरी हो जाती है तो परिजन गाली गलौज करने लगते हैं। परिजन शव छूते तक नहीं हैं। वही लोग शव उठाकर गाड़ी में रखते हैं।

 
विज्ञापन

3 of 5
भैरो घाट पर लगी भीड़ - फोटो : amar ujala
छोटू के परिवार में पत्नी, 18 माह का बेटा और एक गोद ली बेटी है। कहते हैं घर जाने में डर लगता है। फोन पर ही बात कर लेते हैं। ठेकेदारी में महज सात हजार रुपये मेें काम करने वाले छोटू ने बताया कि सोमवार को कैंट में कोरोना मरीज की मौत की सूचना आई। वे दो शवों को लेकर भैरव घाट पर पहुंचे थे। शव को उतारकर वहां पहुंचने में थोड़ी देर हो गई। परिजनों को फोन किया तो उन्होंने गालीगलौज से बात की। 

 

4 of 5
इन गाड़ियों से जाते हैं शव - फोटो : amar ujala
उर्सला के शव वाहन के चालक रजोल का कहना है कि अधिकारियों के आदेश का शत प्रतिशत पालन करते हैं। निराशा तब होती है जब सूचना देने के बाद मृतक के परिजन पता तक नहीं बताते। कई लोग तो मोबाइल बंद कर लेते हैं। अपशब्द बोलते हैं। एक साल से लगातार कोविड पॉजिटिव शवों को घाट पहुंचा रहे हैं। फिर भी लोगों के गुस्से का शिकार होना पड़ता है। डर के कारण रजोल भी पत्नी और बच्चों के पास नहीं जाते। दूर से ही उन्हें निहार लेते हैं। 

 
विज्ञापन
विज्ञापन

5 of 5
इन्हीं गाड़ियों से पहुंचते हैं शव - फोटो : amar ujala
सीएमओ कार्यालय के शव वाहन चालक अमित कुमार कहते हैं कि इस समय मौतें इतनी ज्यादा हो रही हैं कि पूरा-पूरा दिन भागमभाग में बीत जाता है। कोशिश रहती है कि सूचना मिलते ही शवों को घाट तक पहुंचाया जाए। शव को ढोने और कॉल अटेंड करने में न तो खाने का समय मिलता है और न ही सोने का। कभी कभार मौका मिला तो गाड़ी में ही दो-तीन घंटे की नींद पूरी कर लते हैं। 
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें