स्कूलों को यह करना होगा
- खुशनुमा माहौल में सार्थक पढ़ाई के लिए शिक्षक लर्निंग आउटकम डॉक्यूमेंट्स को प्रैक्टिस में लाएं।
- किताबों को ही संपूर्ण न मानकर उसी तक सीमित न रहें। अलग-अलग पाठ्यक्रम का अध्ययन कर बच्चे को लक्ष्य तक पहुंचाने की कोशिश करें।
- अभिभावकों को भी जागरूक करें, ताकि वे बच्चे को उसकी कक्षा के हिसाब से जरूरी प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने के लिए भेजें। हर साल पैरेंट्स-टीचर्स मीट भी करें।
- प्रिंसिपल स्कूल में वार्षिक पाठ्यक्रम बनाने में मदद करें और यह तय करें कि सभी कक्षाओं के लिए शिक्षक ऐसा ही प्लान बनाएं।
- प्रिंसिपल यह भी सुनिश्चित करेंगे कि शिक्षकों ने जो वार्षिक पाठ्यक्रम प्लान बनाया है, वे प्रभावी रूप से लागू किया जा रहा या नहीं।
- हर स्कूल को शिक्षक के लिए तीन दिन का इन हाउस ट्रेनिंग प्रोग्राम करना होगा, जिससे टीचर्स अपनी प्लानिंग को बेहतर और पुख्ता कर सकें।
- स्कूल के असेसमेंट का तरीका भी इसी लर्निंग आउटकम पर केंद्रित होना चाहिए।
- आर्ट, हेल्थ, फिजिकल, लाइफ स्किल्स और वैल्यू एजुकेशन भी इस पाठ्यक्रम में शामिल करें।
- स्कूल प्रबंधन और प्रिंसिपल, टीचर्स को ट्रेनिंग देंगे कि लर्निंग आउटकम डॉक्यूमेंट्स का इस्तेमाल किस तरह से करें।
तय हो गया कितना नॉलेज जरूरी
कानपुर स्थित सीएसजेएमयू के प्रो. मुनेश कुमार कहते हैं कि अब तय कर दिया गया है कि पहली क्लास में पढ़ रहे बच्चे को हिंदी, अंग्रेजी, गणित में कम से कम कितना आना जरूरी है। जैसे पहली क्लास में के बच्चे को लिखवा दिया गया है कि मेरा नाम विमला है, तो इसके हर अक्षर को वह पहचाने। पूछा जाए कि ‘म’ कहां है, तो वह ‘म’ पर अंगुली रखकर बता सके। अपने आसपास मौजूद प्रिंट के अर्थ का अनुमान लगा सके, जैसे टॉफी के कवर पर लिखे नाम को टॉफी, लॉलीपॉप या चॉकलेट बता सके।
विशेषज्ञों की ली जाएगी मदद
सीएसजेएमयू के प्रो. मुनेश कुमार ने बताया कि इसकी जरूरत लंबे समय से थी। लर्निंग आउटकम के साथ सीबीएसई ने स्कूलों में स्पेशल एजुकेटर्स रखने को भी कहा है। अगर लर्निंग आउटकम को ध्यान में रखकर सालभर मेहनत करने पर भी कोई बच्चा इस स्तर तक नहीं पहुंच पा रहा, तो ऐसे बच्चों के साथ स्कूल के स्पेशल एजुकेटर्स काम करेंगे और उन्हें ज्ञान के जरूरी स्तर तक ले जाएंगे। अभी इसके जजमेंट का तरीका क्या होगा, सीबीएसई ने यह स्पष्ट नहीं किया है।