पुराणों के अनुसार धरती का महामानव कहे जाने वाले परशुराम को अमरता का वरदान प्राप्त है। ऐसी मान्यता है कि महेंद्रगिरि नामक पर्वत पर आज भी वह अपने सूक्ष्म शरीर से तपस्या में लीन हैं। पूर्व काल में क्षत्रिय राजा बहुत अत्याचारी और तामसी प्रवर्ती के हो गये थे तब नारायण ने अपने अंश से परशुराम रूप में अवतार लिया और पृथ्वी को इक्कीस बार क्षत्रिय राजाओं से रहित कर दिया था।
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परशुराम जयंती विशेष
जब क्षत्रिय राजाओं की शक्ति बढ गई और उन्हें किसी बात का डर नहीं रहा, क्योंकि यदा कदा मानवों और पृथ्वी पर अत्याचार करने वाले दानव, देवताओं से डरे हुए थे और वो छुप कर रहते थे। क्षत्रिय समाज को पहले तो दानवों और देवताओं का डर था लेकिन जब दानव शांत थे तो देवता भी शांत बैठ गए। तब पृथ्वी पर क्षत्रिय समाज के राजा धीरे-धीरे निरंकुश होते गए, प्रजा को भी तंग करने लगे। इसके अतिरिक्त कई दानव भी क्षत्रिय कुल में जन्म लिए, जो ब्राह्मण नीति की बातों से उनका विरोध करता था उनको भी अपमानित करने लगे। ऐसे ही क्षत्रियों में एक राजा था सहस्त्रबाहु अर्जुन, जिसका उल्लेख पहले हो चुका है जिसने रावण को कैद कर लिया था।
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परशुराम जयंती विशेष
भगवान परशुराम माता रेणुका और ऋषि जमदग्नि की चौथी संतान थे। शिव भक्ति के कारण इन्हें भोले भंडारी से वरदान स्वरूप परशु मिला था। इसी कारण इनका नाम परशुराम पड़ा। माना जाता है कि भगवान परशुराम आज भी धरती पर हैं। इन्हें 7 अमर देवताओं में एक माना जाता है। भगवान परशुराम भगवान विष्णु के छठे अवतार थे। भगवान परशुराम का जन्म अक्षय तृतीया पर हुआ था। खास बात यह है कि इसी तिथि में भगवान के 2 अन्य अवतार नर-नारायण और हयग्रीव का भी अवतरण हुआ था।
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परशुराम जयंती विशेष
पिता की आज्ञा का मान रखने के लिए परशुराम को अपनी ही माता का वध करना पड़ा था। पिता से ही वरदान मांगकर उन्होंने अपनी माता को पुन: जीवित करा लिया। त्रेता युग में भगवान राम ने ही परशुराम को द्वापर युग तक सुदर्शन चक्र संभालने की जिम्मेदारी थी। इसीलिए गुरु संदीपनी के यहां आकर परशुराम ने श्रीकृष्ण को सुदर्शन चक्र सौंपा था। परशुराम ने ही द्वापर युग के सर्वश्रेष्ठ धनुर्धारियों में शुमार भीष्म और कर्ण को धनुर्विद्या सिखाई।
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परशुराम जयंती विशेष
कामधेनु का चमत्कार देखकर सहस्त्रबाहु उस पर मुग्ध हो गया। उसने जमदग्नि से कहा कि वे अपनी गाय उसे दे दें। किंतु जमदग्नि कामधेनु को क्यों देने लगे? उन्होंने इन्कार कर दिया। उनके इन्कार करने पर सहस्त्रबाहु ने अपने सैनिकों को आदेश दिया कि वे कामधेनु को बलपूर्वक अपने साथ ले चलें।सहस्त्रबाहु कामधेनु को अपने साथ ले गया। उस समय आश्रम में परशुराम नहीं थे। परशुराम जब आश्रम में आए, तो उनके पिता जमदग्नि ने उन्हें बताया कि किस प्रकार सहस्त्रबाहु अपने सैनिकों के साथ आश्रम में आया था और किस प्रकार वह कामधेनु को बलपूर्वक अपने साथ ले गया। घटना सुनकर परशुराम क्रुद्ध हो उठे। वे कंधे पर अपना परशु रखकर महिष्मती की ओर चल पड़े, क्योंकि सहस्त्रबाहु महिष्मती में ही निवास करता था। सहस्त्रबाहु अभी महिष्मती के मार्ग में ही था कि परशुराम उसके पास जा पहुंचे, सहस्त्रबाहु ने जब यह देखा के परशुराम प्रचंड गति से चले आ रहे हैं, तो उसने उनका सामना करने के लिए अपनी सेनाएं खड़ी कर दीं। एक ओर हज़ारों सैनिक थे, दूसरी ओर अकेले परशुराम थे, घनघोर युद्ध होने लगा।
परशुराम ने अकेले ही सहस्त्रबाहु के समस्त सैनिकों को मृत्यु के मुख में पहुंचा दिया। जब सहस्त्रबाहु की संपूर्ण सेना नष्ट हो गई, तो वह स्वंय रण के मैदान में उतरा, वह अपने हज़ार हाथों से हज़ार बाण एक ही साथ परशुराम पर छोड़ने लगा। परशुराम उसके समस्त बाणों को दो हाथों से ही नष्ट करने लगे। जब बाणों का कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ा, तो सहस्त्रबाहु एक बड़ा वृक्ष उखाड़कर उसे हाथ में लेकर परशुराम की ओर झपटा। परशुराम ने अपने बाणों से वृक्ष को तो खंड-खंड कर ही दिया, सहस्त्रबाहु के मस्तक को भी काटकर पृथ्वी पर गिरा दिया। वह रणभूमि में सदा के लिए सो गया।परशुराम सहस्त्रबाहु को मारने के पश्चात कामधेनु को लेकर अपने पिता की सेवा में उपस्थित हुए। महर्षि जमदग्नि कामधेनु को पाकर अतीव हर्षित हुए। उन्होंने परशुराम को ह्रदय से लगाकर उन्हें बहुत-बहुत आशीर्वाद दिए। परशुराम अपने पिता के अनन्य भक्त थे। वे उन्हें परमात्मा मानकर उनका सम्मान किया करते थे। जमदग्नि बहुत बड़े योगी थे। उन्होंने योग द्वारा सिद्धियां प्राप्त की थीं।