शनिवार को आयुध निर्माणी दिवस मनाया जा रहा है। इस अवसर पर कानपुर के अर्मापुर इस्टेट के समाज सदन में शहर की तीन आर्डनेंस फैक्ट्रियों की ओर से संयुक्त रक्षा प्रदर्शनी लगाई गई। आर्डनेंस फैक्ट्री, फील्डगन फैक्ट्री व स्माल आर्म्स फैक्ट्री के स्टॉलों में एक से बढ़कर एक हथियार देखने को मिले। इनकी खूबियां सुनकर लोगों ने दांतों तले उंगली दबा ली। मम्मियों के साथ बेटियों ने भी अत्याधुनिक हथियार अपने हाथों में उठाएं।
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हथियारों की प्रदर्शनी
18 मार्च को होने वाले आयुध निर्माणी दिवस की पूर्व की संध्या पर फील्डगन फैक्ट्री कानपुर के महाप्रबंधक शैलेंद्र नाथ ने भविष्य की योजनाओं का खुलासा किया। उन्होंने बताया कि चुनौतियों से निपटने के लिए आर्डनेंस फैक्ट्रियों में आधुनिकीकरण तेजी से शुरू हो चुका है। संभव है कि भविष्य में तोप निर्माण की पूरी जिम्मेदारी उन्हें मिल जाए। इससे पहले फील्डगन फैक्ट्री में कैरिज का काम शिफ्ट किया जाएगा। अभी देश में एकलौती गन कैरिज फैक्ट्री जबलपुर में है। यहां सेना से मिले शस्त्रों की मरम्मत होती है। इसकी प्रक्रिया लंबी है।
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हथियारों की प्रदर्शनी
तोप में टी-72, टी-90, अर्जुन की बैरल, छोटी गन की श्रेणी में इंडियन फील्ड गन, लाइन फील्ड गन, 130 एमएम बोर की रॉकेट बैरल यूनिट (आरयूबी-6000 व आरयूबी-1200) के बैरल, आयुध आदि। रिवाल्वर की श्रेणी में .30 मार्क-3 व निर्भीक का उत्पाद किया जा रहा है।
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हथियारों की प्रदर्शनी
कानपुर की फील्डगन फैक्ट्री में एक साल के भीतर 180 करोड़ रुपये की लागत वाली फोर्जिंग प्रेस मशीन आ जाएगी। इसकी स्थापना में करीब 250 करोड़ रुपये का खर्च आएगा। दुनिया की सबसे उन्नत तकनीक वाली इस मशीन की मदद से फील्डगन फैक्ट्री में दुनिया की हर तरह की तोप की बैरल बनाई जा सकेगी। यह तकनीक फिलहाल चेेकोस्लाविया व जर्मनी के पास है।
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हथियारों की प्रदर्शनी
तोप का बैरल बनाने में धातु को कई प्रक्रियाओं से होकर गुजरना पड़ता है। क्वालिटी बेहतर करने के लिए धातु को तीव्र तापमान में गलाने, उसके अपशिष्ट को अलग करने, फिर आकार देने के अलावा अन्य तरह की प्रक्रियाएं होती हैं। अभी कई सारे काम अन्य यूनिटों में कराने पड़ते हैं। फोर्जिंग प्रेस आने से ये सभी प्रक्रियाएं एक ही छत के नीचे संभव हो सकेंगी। इससे बैरल तैयार करने में समय कम लगेगा और सेना को समय पर आर्डर पूरा हो सकेगा।
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हथियारों की प्रदर्शनी
राकेट लांचर पिनाक-2 दुश्मन के छक्के छुड़ा देता है। यह 60 कि लोमीटर दूर तक मार करता है। इसके पहले वर्जन पिनाक मार्क-1 की मारक क्षमता सिर्फ 40 किलोमीटर ही थी। पिनाक-2 के एक पीस की निर्माण लागत करीब साढ़े चार लाख रुपये है। यानी दुश्मन पर एक गोला दगता है तो इतने रुपये नष्ट हो चुके होते हैं।
कानपुर की स्मॉल आर्म्स फैक्ट्री में बनी मशीन गन मैग एक मिनट में एक हजार गोली दागती है। खास बात यह है कि इसकी एक गोली ही दो से तीन किमी दूर दुश्मन के चीथड़े उड़ा देती है। इस मशीन गन की तकनीक 35 साल पहले बेल्जियम से भारत ट्रांसफर हुई थी। तब से कानपुर की आर्डनेंस फैक्ट्री स्वत: इसका निर्माण कर रही है। इसे सेना की सभी विंगों में इस्तेमाल किया जाता है।स्मॉल आर्म्स फैक्ट्री में बनी लाइट मशीन गन (एलएमजी) और राइफल भी बेजोड़ हैं। एलएमजी सात किलो मीटर तक मार करती है। राइफल चार किलोमीटर तक। एलएमजी और राइफल दोनों एक बार में 650 गोलियां दाग सकती हैं अंतर बस दूरी का है। सैनिक दोनों गनों को लेकर चल सकता है। कानपुर में दोनों प्रकार की 20 हजार गनों का उत्पादन होता है।