कानपुर के जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज की एमबीबीएस फाइनल वर्ष की छात्रा अमृता को पानी से बहुत डर लगता था। अकेलेपन में घबराहट होती थी। स्ट्रेस और अवसाद बढ़ने पर वह गंगा बैराज के अटल घाट पर जाकर अकेले बैठ जाती थी। इस बात का न तो उसकी दोस्त ने ध्यान दिया और न ही मेडिकल कॉलेज के अधिकारियों ने समझने की कोशिश की।
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अमृता सिंह की फाइल फोटो
- फोटो : अमर उजाला
कॉलेज के विशेषज्ञों का कहना है कि ये अवसाद के इंडीकेटर हैं। अगर इन्हें पहले से चिह्नित कर लिया जाए तो मरीज की स्थिति बिगड़ने से बच सकती है। अमृता के मिजाज के संबंध में गर्ल्स छात्रावास की ज्यादातर छात्राएं जानती थीं। लेकिन इस पर ध्यान नहीं दिया गया।
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अमृता सिंह की फाइल फोटो
- फोटो : अमर उजाला
एमबीबीएस में प्रवेश के वक्त छात्र-छात्राओं की मानसिक और शारीरिक सेहत की जांच भी की जाती है। लेकिन बोर्ड अमृता के मनोवैज्ञानिक स्थिति को समझ नहीं पाया। परिजनों ने भी उसके अतिसंवेदनशील मिजाज के बारे में नहीं बताया। यही वजह रही कि चार साल तक कॉलेज में पढ़ने के बाद भी उसकी कोई काउंसलिंग नहीं हो पाई।
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बैराज पर एमबीबीएस स्टूडेंट और पुलिस
- फोटो : अमर उजाला
पढ़ाई के दौरान स्ट्रेस बढ़ने पर बहुत से छात्र-छात्राओं की काउंसलिंग होती है। इलाज चलता है। लेकिन अमृता का मनोरोग विभाग में इलाज भी नहीं चल रहा था।
मेडिकल कॉलेज की प्राचार्य डॉ. आरती लालचंदानी ने अमृता के मानसिक स्थिति के संबंध में किसी तरह की रिपोर्ट मिलने और उसका इलाज चलने से इंकार किया। मनोरोग विशेषज्ञों का कहना है कि तन्हाई और पानी से डर जैसे लक्षण अवसाद के लक्षण हैं।