लोकसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है। सभी राजनीतिक पार्टियां अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपना रहीं हैं। वहीं बीजेपी ने कई दिग्गज नेताओं को चुनावी मैदान में उतारा है। आज हम आपको बताने जा रहे हैं कानपुर, फर्रुखाबाद, फतेहपुर, हमीरपुर-महोबा, जालौन, अकबरपुर, इटावा, कन्नौज के भाजपा प्रत्याशियों के बारे में...
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सत्यदेव पचौरी (फाइल फोटो)
कानपुर, सत्यदेव पचौरी
गोविंदनगर विधानसभा क्षेत्र से विधायक सत्यदेव पचौरी ने 1972 में वीएसएसडी कॉलेज छात्रसंघ कानपुर अध्यक्ष के रूप में विद्यार्थी परिषद का चुनाव लड़ा। 1968 से 1975 तक भारतीय जनसंघ में सक्रिय भूमिका में रहे। 1975 से 1977 तक लोकनायक जयप्रकाश आंदोलन से जुड़े रहे। 1978 से भाजयुमो में पदाधिकारी रहे। 1980 में भाजपा उप्र कार्य समिति के सदस्य रहे।
1991 में पहली बार आर्यनगर विधानसभा क्षेत्र से विधायक चुने गए, इसी वर्ष विधानमंडल के कोषाध्यक्ष बनाए गए। 1991 से 2002 तक लोहा व्यापार मंडल कानपुर के अध्यक्ष रहे।
1992 में यूपी भाजपा के प्रदेश अनुशासन समिति के अध्यक्ष बने। 1993 में सपा के हाजी मुश्ताक सोलंकी से हारे थे आर्यनगर का चुनाव। 1994 से 2004 तक भाजपा प्रदेश उपाध्यक्ष रहे।
2004 में भाजपा के टिकट पर लोकसभा महानगर क्षेत्र से चुनाव लड़े। 2012 में गोविंदनगर विधानसभा क्षेत्र से दूसरी बार विधायक निर्वाचित। 2017 में गोविंदनगर विधानसभा क्षेत्र से तीसरी बार विधायक चुने गए।2017 की प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री के रूप में कार्य कर रहे हैं।
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देवेंद्र सिंह भोले (फाइल फोटो)
अकबरपुर, देवेंद्र सिंह भोले
देवेंद्र सिंह भोले ने 2014 में पहली बार अकबरपुर क्षेत्र से लोकसभा का चुनाव लड़ा और जीत गए। 1993 और 1996 में दो बार विधानसभा का चुनाव डेरापुर क्षेत्र से लड़े और जीते। एक बार सिंकदरा और दो बार डेरापुर से विधायकी का चुनाव हार चुके हैं। एक बार ब्लाक प्रमुख भी रह चुके हैं।
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मुकेश राजपूत (फाइल फोटो)
फर्रुखाबाद: मुकेश राजपूत (सांसद)
सांसद मुकेश राजपूत वर्ष 2000 से 2005 तक खुद और 2006 से 2012 तक इनकी पत्नी सौभाग्यवती राजपूत जिला पंचायत अध्यक्ष रहीं। मुकेश ने एक बार पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की पार्टी राष्ट्रीय क्रांति पार्टी से भी लोकसभा का चुनाव लड़ा है। 2014 में मुकेश राजपूत फर्रुखाबाद से लोकसभा चुनाव जीतकर सांसद बने। एक सितंबर 2014 को उन्हें खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय के तहत परामर्श समिति का सदस्य भी चुना गया। उनका जन्म 8 अगस्त 1968 को फर्रुखाबाद में हुआ और स्नातक तक शिक्षा ग्रहण की। उनका खेती मुख्य पेशा है। उनके तीन बेटे व एक बेटी हैं और वह फर्रुखाबाद में ठंडी सड़क पर रहते हैं।
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साध्वी निरंजन ज्योति (फाइल फोटो)
फतेहपुर: साध्वी निरंजन ज्योति (सांसद)
कथावाचक से केंद्रीय मंत्री तक का सफर पूरा करने वाली साध्वी अब निरंजनी अखाड़े की महामंडलेश्वर भी हैं। निषाद बिरादरी से ताल्लुक रखने वाली निरंजन का जन्म 1967 में उत्तर प्रदेश के हमीरपुर जिले की पतिउरा गांव के मजरा मलिहाताला में हुआ था। बारहवीं तक पढ़ी निरंजन ने 21 साल की उम्र में स्वामी अच्युतानंद से गुरुदीक्षा लेकर सन्यास लिया था। विहिप में केंद्रीय सहमंत्री रही यूपी में भगवा ब्रिगेड का चेहरा मानी जाती हैं। दुर्गा वाहिनी, विहिप से होते हुए बीजेपी में सक्रिय हुईं निरंजन की छवि तेज तर्रार व बेबाक नेता की रही है। गेरुआ वस्त्र पहनती हैं और विशेष शैली में प्रवचन भी देती हैं। 2002 में बीजेपी से विधानसभा का चुनाव लड़ीं, मगर हार गईं। 2007 में फिर हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद 2012 के चुनाव में हमीरपुर सदर सीट से विधायक बनीं। वर्ष 2014 में लोकसभा में बीजेपी ने फतेहपुर से इन्हें अपना चेहरा बनाया। पहली बार में ही सांसद बन गईं।
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पुष्पेंद्र चंदेल (फाइल फोटो)
हमीरपुर-महोबा : पुष्पेंद्र चंदेल (सांसद)
हमीरपुर-महोबा-तिंदवारी संसदीय सीट से लोकसभा चुनाव में भाजपा से एक बार फिर उम्मीदवार बनाए गए पुष्पेंद्र सिंह चंदेल 1995 में महोबा जनपद बनने के बाद भाजयुमो के जिलाध्यक्ष बनाए गए। 2007 में भाजपा के टिकट पर विधानसभा चुनाव हार गए। 2014 में पुष्पेंद्र सिंह चंदेल पहली बार में ही भाजपा से सांसद चुने गए। पांच साल तक भाजपा में सांसद रहते उन्होंने सांसद निधि से संसदीय क्षेत्र में विकास कार्य कराने के साथ-साथ सभी रेलवे स्टेशनों में स्टील की चेयर की व्यवस्था कराई। सत्ता पक्ष में रहने के बाद भी उनकी साफ-सुथरी छवि के कारण पार्टी ने पुष्पेंद्र सिंह चंदेल पर एक बार फिर दांव लगाया है। जिला बनाओ समिति के संयोजक पुष्कल सिंह के साथ पुष्पेंद्र सिंह चंदेल ने महोबा जिला बनाओ की लड़ाई लड़ी थी।
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भानु प्रताप वर्मा (फाइल फोटो)
जालौन : भानु प्रताप वर्मा (सांसद)
जालौन जिले के कोंच में मोहल्ला मालवीय नगर निवासी भानु प्रताप वर्मा ने 1989 में सभासद से राजनीतिक जीवन की शुरूआत की थी। उनका जन्म 15 जुलाई 1957 को हुआ था। पिता का नाम स्व. सुमेर वर्मा है। पत्नी राममूर्ति के साथ ही पांच संतान हैं। एमए, एलएलबी तक शिक्षा ग्रहण की है। 1989 में कोंच नगर पालिका के भाजपा से सभासद चुने गए और इसके बाद उनका सियासी कद बढ़ता गया। वह 1991 में कोंच विधानसभा क्षेत्र से विधायक चुने गए और उसके बाद 1996, 1998, 2004, 2014 में अब तक चार बार सांसद चुने जा चुके हैं।
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रामशंकर कठेरिया (फाइल फोटो)
इटावा: रामशंकर कठेरिया (सांसद एवं चेयरमैन एससीएसटी कमीशन)
इटावा जनपद में भरथना क्षेत्र के नगरिया सरावा गांव निवासी रामशंकर कठेरिया के राजनीतिक जीवन की शुरूआत आरएसएस के प्रचारक के रूप में हुई और वह आगरा में ही शिक्षक के साथ भाजपा के जिलाध्यक्ष भी रहे। 2009 में पहली बार आगरा सुरक्षित सीट से सांसद चुने गए। 2014 में दूसरी बार भी आगरा सुरक्षित सीट से सांसद चुने गए और मोदी सरकार में मानव संसाधन विकास राज्यमंत्री बनाए गए। 2017 में वह अनुसूचित जाति एवं जनजाति आयोग के अध्यक्ष बनाए गए।
कन्नौज के पीएसएम डिग्री कॉलेज से छात्रसंघ की राजनीति शुरू करने वाले सुब्रत पाठक 2003 में युवा मोर्चा के जिलाध्यक्ष बनाए गए। 2007 में भाजपा जिलाध्यक्ष की बागडोर संभाली। 2009 में भाजपा ने उन्हें पहली बार लोकसभा का प्रत्याशी बनाया लेकिन सपा से अखिलेश यादव ने उन्हें पटकनी दी। इसके बाद पार्टी ने उन्हें 2011 में आजीवन सहयोग निधि प्रकोष्ठ का प्रदेश संयोजक बनाया। 2013 में प्रदेश कार्यसमिति के सदस्य के रूप में शामिल हुए। 2014 के चुनाव में समाजवादी पार्टी की डिंपल यादव को 489,164 यानी (43.9) वोट मिले थे। जबकि बीजेपी के सुब्रत पाठक ने डिंपल यादव को कड़ी टक्कर दी थी। सुब्रत पाठक को 469,257 (42.1) वोट मिले थे। 2015 में कन्नौज में हुए दंगों के बाद भाजपा ने उन्हें 2016 में भाजयुमों प्रदेश अध्यक्ष जैसे बड़े पद पर जिम्मेदारी दी। 2018 में उन्हें भाजपा की मुख्य बॉडी में प्रदेश मंत्री के पद की जिम्मेदारी मिली।