कन्नौज बस हादसे की जांच ने अब तेजी पकड़ी है। स्लीपर बस के पंजीयन व सामान्य बस को स्लीपर बनाने अनुमति देने वाले अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। उस आर्डर पर हस्ताक्षर किसने किए थे। इसका ही रिकॉर्ड देखने एआरटीओ कार्यालय में उप परिवहन आयुक्त पहुंचे। हादसे वाली बस में 47 से 51 सवारियां बैठी थीं। कुल दस लोगों की मौत की पुलिस ने पुष्टि की है।
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कन्नौज हादसा
- फोटो : अमर उजाला
जो कंकाल मिले हैं उनका डीएनए टेस्ट होगा। तभी पीड़ितों को विभाग से मुआवजा मिल सकेगा। बस में पीछे शीशे की जगह टीन लगी थी और इमरजेंसी गेट नहीं था। ये जानकारी देते हुए उप परिवहन आयुक्त कानपुर परिक्षेत्र देवेंद्र कुमार त्रिपाठी ने बताया कि प्रदेश मुख्यालय के आदेश पर उन्होंने कन्नौज में बस मालिक समेत चार लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया है।
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कन्नौज बस-ट्रक हादसा
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छिबरामऊ में हादसे का शिकार हुई बस का अल्टरेशन (बदलाव) किया गया था। किसी भी वाहन के बदलाव की व्यवस्था मोटर व्हेकिल एक्ट में धारा 52 के अंतर्गत है। हादसे वाली बस की लंबाई 12 मीटर की जगह 12.8 मीटर पाई गई जो गलत है। केवल एयरपोर्ट पर चलने वाली बसों को ही ज्यादा लंबाई में पास किया जाता है। इसकी फिटनेस के अलावा किस अधिकारी के कार्यकाल में बस पंजीकृत हुुई और अल्टरेशन के दौरान किस अधिकारी ने अनुमति दी है, इसकी छानबीन करने आए हैं। स्लीपर बसों की पत्रावली आगरा भेज दी गई है। फिर भी वे रिकार्ड निकलवा रहे हैं।
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कन्नौज हादसा
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बताया कि दोषी के खिलाफ कार्रवाई तय है। उन्होंने आरआई जीवन कुमार को वाहनों की फिटनेस करने के बारे में बताया और अपने सामने ही दो वाहनों की नाप जोख करवाकर फिटनेस सत्यापन करने के गुर सिखाए। वहीं आयुक्त को देखकर कई वाहन स्वामी अपने वाहन समेत गायब हो गए। त्रिपाठी ने बताया कि अब वही स्लीपर बसें चलेंगी, जिनमें इमरजेंसी गेट होगा और जिनकी लंबाई 12 मीटर ही होगी।
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कन्नौज हादसा
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स्लीपर बसों के खिलाफ अभियान चलाकर कार्रवाई की जाएगी। कानपुर में अभियान चल रहा है। 19 बसें वहां पर सीज की गई हैं। बताया गया कि एआरटीओ कार्यालय में वर्ष 2016 व 2018 में कानपुर व कन्नौज के आरआई व लिपिक काम करने आए थे। उसी दौरान बस को सामान्य बस से स्लीपर बस में बदला गया था।
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कन्नौज हादसा
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कन्नौज प्रशासन पर फोड़ा ठीकरा
उप परिवहन आयुक्त देवेंद्र कुमार त्रिपाठी ने बताया कि दुर्घटना में केवल बस की ही खामी नहीं थी। प्रशासन ने जब उस स्थान को छह वर्ष पहले ब्लैक स्पाट में चिह्नित किया था तो वहां पर इंतजाम क्यों नहीं किए। सड़क का चौड़ीकरण नहीं करवाया गया। सड़क पर सोल्डर नहीं बनाए गए। मानवीय भूल के अलावा दृश्यता भी मुख्य कारण है।
विमल के पक्ष में भी दलील देने से नहीं चूके आयुक्त
उप आयुक्त ने बताया कि डग्गामार वाहन का शब्द मोटर व्हेकिल एक्ट में नहीं है। जिस वाहन के पास परमिट, पंजीयन, बीमा, फिटनेस है वह वाहन डग्गामार नहीं है। बताया कि विमल की एक बस महीने में 9 हजार रुपये टैक्स जमा कर रही है। बस की किस्त 40 हजार से कम नहीं है। ड्राइवर व हेल्पर मिलाकर महीने में अस्सी हजार का खर्चा है। फर्रुखाबाद व आस पास के जनपदों में टूरिज्म के कोई स्थान नहीं है। ऐसे में बस मालिक आखिर क्या करें। विमल के पक्ष में धारा प्रवाह बोल रहे उप परिवहन आयुक्त से पूछा कि आखिर किसने बस का धंधा करने के लिए कहा और इतनी मौत के बाद भी विभाग विमल की तारीफ में पुल बांध रहा है। इस पर आयुक्त खामोश हो गए।