हिंदू धर्म में पितृपक्ष का विशेष महत्व है। मान्यता है कि पितृपक्ष में पितर धरती पर आकर लोगों को आशीर्वाद देते हैं। ये पितर पशु-पक्षियों के रूप में हमारे आसपास आते हैं। श्राद्ध तर्पण के बाद कुछ पशुओं और पक्षियों को भोजन कराने की परंपरा है। सूरज निकलते ही घर की मुंडेर पर बैठे कौवों की 'काँव-काँव' शुरू हो जाती हैं, जो सूरज ढलने तक जारी रहती हैं।
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पशुओं और पक्षियों को भोजन कराने की परंपरा है
- फोटो : अमर उजाला
शाम को कौए अपने बसेरे की तरफ उड़ जाते हैं। विष्णु पुराण में श्राद्धपक्ष में भक्ति और विनम्रता से यथाशक्ति भोजन कराने की बात कही गई है। कौए को पितरों का प्रतीक मानकर श्राद्ध पक्ष के सोलह दिनों तक भोजन कराया जाता है। भादौ महीने के सोलह दिन कौवा हर घर की छत का मेहमान बनता है।
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हिंदू धर्म में पक्षियों को भोजन कराने की परंपरा है
- फोटो : अमर उजाला
ये सोलह दिन श्राद्ध पक्ष के दिन माने जाते हैं। कौवा एवं पीपल को पितृ प्रतीक माना जाता है। इन दिनों कौए को खाना एवं पीपल को पानी पिलाकर पितरों को तृप्त किया जाता है। हिंदू धर्म में मान्यता है कि गाय, कुत्ता, कौवा और चींटी को पितृपक्ष में भोजन कराना चाहिए। इन्हीं पशु पक्षियों के रूप में हमारे पितर आसपास मौजूद रहते हैं।
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हिंदू धर्म में गाय को भोजन कराने की परंपरा है
- फोटो : अमर उजाला
श्राद्ध के समय इनके लिए भी आहार का एक अंश निकाला जाता है, तभी श्राद्ध कर्म पूर्ण होता है। श्राद्ध करते समय पितरों को अर्पित करने वाले भोजन के पांच अंश निकाले जाते हैं। गाय, कुत्ता, चींटी, कौवा और देवताओं के लिए। इन पांच अंशों का अर्पण करने को पञ्च बलि कहा जाता है।
पितरों को श्राद्ध देने के लिए जुटे लोग।
- फोटो : chandauli
कुत्ता जल तत्व का प्रतीक है ,चींटी अग्नि तत्व का, कौवा वायु तत्व का, गाय पृथ्वी तत्व का और देवता आकाश तत्व का प्रतीक हैं। इस प्रकार इन पांचों को आहार देकर हम पंच तत्वों के प्रति आभार व्यक्त करते हैं। केवल गाय में ही एक साथ पांच तत्व पाए जाते हैं। इसलिए पितृ पक्ष में गाय की सेवा विशेष फलदाई होती है। मात्र गाय को चारा खिलाने और सेवा करने से पितरों को तृप्ति मिलती है साथ ही श्राद्ध कर्म सम्पूर्ण होता है।