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भरे गुस्से में अगर कोई इस शहर में आ जाए तो वो हंस-हसंते हो जाएगा पागल: संजय मिश्रा

Mon, 16 Jul 2018 05:12 PM IST
गौरव शुक्ला, अमर उजाला, कानपुर
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एक्टर संजय मिश्रा
'कनपुरिया भाषा में जो बात है वो किसी भाषा में नहीं। इन दिनों सोशल मीडिया के जरिए कनपुरिया लैंग्वेज पूरे देश में छाई हुई है। यहां के लोगों का बातचीत करने का तरीका बड़ा ही मजाकिया है। भरे गुस्से में अगर कोई कानपुर आ जाए तो एक मिनट में ही यहां की बोली परेशान से परेशान आदमी को भी खुश कर सकती है। गुस्से करने वाला इंसान हंसते-हंसते पागल भी हो सकता है। मेरा कानपुर और यहां की स्टाइल से बहुत पुराना नाता है।'

यह कहना है कि बॉलीवुड के मशहूर कॉमडी एक्टर संजय मिश्रा का। संजय रविवार को एक निजी कार्यक्रम में कानपुर शहर आए हुए थे। यहां उन्होंने 'अमर उजाला' से एक खास बातचीत में कहा कि जब अश्वनि धीर ने मुझे ऑफिस-ऑफिस के लिए बुलाया तो मैं स्क्रिप्ट पढ़कर हैरान हो गया। मैंने सोचा कि मैं ये बोलूंगा और करूंगा कैसे। लेकिन जब मैं शुक्ला का किरदार निभा रहा था तो मैं खुद को कनपुरिया महसूस कर रहा था। मेरा यह स्टाइल लोगों को बहुत पसंद आया। इसी वजह से आज भी लोग मुझे संजय मिश्रा नहीं ‘संजय शुक्ला’ कहते हैं। संजय का कहना है कि कानपुरशहरवासियों को यहां के कुछ इलाकों के नाम जैसे- फेथफुलगंज, हैलट पुल, अफीम कोठी, झकरकटी, कलक्टरगंज कभी भी नहीं बदलना चाहिए। ये मोहल्ले कानपुर की पहचान हैं। संजय ने शहर की मशहूर चाट, मिठाई खाई और खूब सारे चुसउआ आम भी खरीदे। 

आगे की स्लाइड में पढ़ेंः- जब संजय को लगा उन्हें सबसे बड़ा अवार्ड मिल गया....
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संजय मिश्रा
संजय ने अपना एक अनुभव साझा करते हुए बताया कि साल 2009 की बात थी जब वह काफी बीमार हो गए और मजबूरी में अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। बगल वाले वार्ड में एक महिला भर्ती थी जिसका लिवर ट्रांसप्लांट होना था। जब उस मरीज के घरवालों को पता चला कि इसी अस्पताल में मैं भी एडमिट हूं तो वो लोग मेरे पास आए। उन्होंने बताया कि लिवर खराब होने की वजह से वह महिला कई दिनों से दर्द से कराह रही है। वह चाहती है कि उसे इस जिंदगी से आजादी मिल जाए। मैं भी अस्पताल में बीमारी की वजह से भर्ती था। मैं जब उस महिला के पास पहुंचा तो वह मुझे देखते ही मुस्करा उठी। बस उस दिन से मुझे ऐसा लगा कि मैंने बहुत बड़ा अवार्ड जीत लिया है। क्योंकि जो इंसान भीषण दर्द के साथ जिंदगी और मौत से जूझ रहा है मेरा चेहरा देखते ही उसके चेहरे पर हंसी छूट जाए इससे बड़ी तपस्या मेरे लिए कुछ भी नहीं थी। संजय अपने बारे में बताते हैं कि वह कभी भी अपने आप को बूढ़ा नहीं महसूस होने देते। उनका कहना है कि जब तक इंसान जिंदा है तब तक वह जवान है, जब तक मौत नहीं आ जाती वह जवान है।
आगे की स्लाइड में पढ़ेंः- सफर का असली मजा तो ट्रेन की यात्रा में....
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एक्टर संजय मिश्रा
संजय ने मजाकिया अंदाज में कहा कि आजकल लोगों के पास जैसे ही पैसा आ जाता है वह बदल जाते हैं। वह दरअसल अमीर होते ही हंसना भूल जाते हैं। सफर का जिक्र करते हुए संजय ने कहा कि ट्रेन की यात्रा और प्लेन की यात्रा में जमीन आसमान का फर्क है। सफर का असली मजा तो ट्रेन की यात्रा में ही मिलता है। संजय ने कहा कि पहले जब मैं अपने घर बिहार जाता था तो ट्रेन में अमिताभ बच्चन की चर्चा होती थी। हर बोगी में एक ने एक बार बच्चन जी के बारे में लोग बातचीत जरूर करते थे। वहीं अगर आप प्लेन की यात्रा कर रहे हों तो आपका अधिकतर समय खुद के बॉडी लैंग्वेज को सुधारने में ही खर्च हो जाता है। संजय इससे पहले ‘बंटी और बबली’ फिल्म की शूटिंग के लिए कानपुर आए थे।

आगे की स्लाइड में पढ़ेंः- कलाकार और पत्रकार का नजरिया बिल्कुल अलग...
 

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एक्टर संजय मिश्रा
संजय ने बताया कि दुनिया को देखने का नजरिया एक पत्रकार और कलाकार का बिल्कुल अलग ही होता है। ये सभी दुनिया को बहुत दूर से और अलग ढंग से देखते हैं जिसकी वजह से उन्हें लोगों को समझने में परेशानी नहीं होती। आम लोगों को भी ऐसा ही नजरिया रखना चाहिए। संजय ने उदाहरण देते हुए कहा कि सड़क पर अगर दूसरी गाड़ी वाला आपका को इंडिकेटर तोड़ दे तो आप को गुस्सा बिल्कुल भी नहीं होना चाहिए। सामने वाले की मनोदशा को समझना बहुत जरूरी है। क्या पता कि सामने वाला जिसने आप की गाड़ी की इंडिकेटर तोड़ा है वह आप से भी ज्यादा परेशान है। दुनिया को अगर हम दूर के नजरिए से देखते हैं तो हमें कभी गुस्सा नहीं आता और इससे हमारी समझ भी विकसित होती है।
 

आगे की स्लाइड में पढ़ेंः- जब अनुपम श्याम ने मेरी दोस्त का माथा चूम लिया...
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एक्टर संजय मिश्रा
संजय मिश्रा ने अपने दोस्त अनुपम श्याम का एक किस्सा सुनाया। उन्हें बताया कि एक बार वह मुंबई में अपनी एक बेहद खूबसूरत दोस्त के साथ बैठे हुए थे। उसी दौरान उनके खास दोस्त अनुपम श्याम भी आ गए। जब मैंने अनुपम श्याम को बताया कि यह मेरी दोस्त हैं तो उन्होेंने फौरन उस लड़की का माथा चूम लिया और कहा कि- ‘बहुत खूबसूरत और अच्छी दोस्त हैं’। जब मैंने यह बताया कि वह लखनऊ से है तो वह और भी ज्यादा खुश हो गए और उसका एक बार फिर माथा चूमा और कहा कि मैं भी प्रतापगढ़ से हूं। लखनऊ तो मेरा ही शहर है। यहां के लोग बहुत अच्छे होते हैं।
 

आगे की स्लाइड में पढ़ेंः- ऑफिस-ऑफिस के ‘शुक्ला जी’ सबसे पसंदीदा कैरेक्टर...
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एक्टर संजय मिश्रा
छह अक्टूबर 1963 को बिहार में जन्मे संजय मिश्रा का बचपन से ही रुझा एक्टिंग और म्यूजिक में था। उन्होंने नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा से तीन साल का एक्टिंग कोर्स भी किया था। संजय मिश्रा ‘फंस गए रे ओबामा’ और ‘आंखों देखी’ फिल्म के लिए नेशनल अवार्ड भी जीत चुके हैं। इसके अलावा संजय ने सत्या, दिल से, साथिया, चरस, प्लान, टैंगो चार्ली, गुरु, अनवर, वेलकम, हल्ला बोल, टशन, गोलमाल-3, खिलाड़ी 786, जॉली एलएलबी, किक, दिलवाले, बागी, गेस्ट इन लंदन, न्यूटन, अंग्रेजी में कहते हैं और गोलमाल अगेन समेत दर्जनों हिट बॉलीवुड फिल्मों में काम किया है। संजय को खुद के द्वारा निभाया गया ‘शुक्ला जी’ (ऑफिस-ऑफिस सीरियल) का कैरेक्टर बेहद पसंद है। संजय मिश्रा टीवी पर ऑफिस-ऑफिस सीरियल के ‘शुक्ला जी’ कैरेक्टर रोल की वजह से काफी फेमस हुए थे। उन्होंने लापतागंज, सीआईडी, हिप-हिप हुर्रे, नया दौर, कॉमेडी सर्कस समेत तमाम सीरियल में काम भी किया है। इसी साल उनकी दो बॉलीवुड फिल्में रिलीज हो रही हैं।
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