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जानें, महान क्रांतिकारी भगत सिंह कानपुर आकर क्यों बन गए थे पत्रकार

Sat, 25 Mar 2017 01:15 AM IST
गौरव शुक्ला, अमर उजाला, कानपुर
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भगत सिंह शहीदी दिवस
शहीद-ए-आजम भगत सिंह शादी के डर से अपना घर छोड़कर कानपुर भाग आये थे। लेकिन शायद ये खुद भगत सिंह को ही नहीं पता था कि उनकी किस्मत उन्हें एक ऐसे मुकाम पर ले जाने वाली है जो आगे चलकर युवाओं के लिए आदर्श बन जाएगी। आज शहीदी दिवस (23 मार्च) के मौके पर हम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महान क्रांतिकारी भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव के जीवन से जुड़ी उन तमाम बातों को साझा करने जा रहे हैं, जिनके बारे में कम ही लोग जानते होंगे।  
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भगत सिंह शहीदी दिवस
23 मार्च 1931 की रात भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की देश-भक्ति को अपराध की संज्ञा देकर फांसी पर लटका दिया गया। कहा जाता है कि मृत्युदंड के लिए 24 मार्च की सुबह तय की गई थी लेकिन किसी बड़े जनाक्रोश की आशंका से डरी हुई अँग्रेज़ सरकार ने 23 मार्च की रात को ही इन क्रांति-वीरों की जीवनलीला समाप्त कर दी। रात के अँधेरे में ही सतलुज के किनारे इनका अंतिम संस्कार भी कर दिया गया। 'लाहौर षड़यंत्र' के मुक़दमे में भगतसिंह को फाँसी की सज़ा दी गई थी तथा केवल 24 वर्ष की आयु में ही, 23 मार्च 1931 की रात में उन्होंने हँसते-हँसते, 'इनक़लाब ज़िदाबाद' के नारे लगाते हुए फाँसी के फंदे को चूम लिया। भगतसिंह युवाओं के लिए भी प्रेरणा स्रोत बन गए। वे देश के समस्त शहीदों के सिरमौर थे।  
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भगत सिंह शहीदी दिवस
यूपी के कानपुर शहर से शहीद भगत सिहं के क्रांतिकारी जीवन से गहरा रिश्ता रहा है। दिल्ली के बाद कानपुर में उनका बार-बार आना-जाना रहता था। उन्होंने 8 अप्रैल 1929 को सेन्ट्रल असेम्बली में बम फेंका। कानपुर से छपने वाले गणेश शंकर विद्यार्थी के क्रांतिकारी अख़बार ‘प्रताप’ में नौकरी करते वक्त वे दिल्ली में साम्प्रदायिक दंगा कवर करने आए । दंगा दरियागंज में हुआ था। वे दिल्ली में सीताराम बाजार की एक धर्मशाला में रहते थे। कानपुर शहर ने उनको लेकर बड़ा ही ठंडा रुख अपनाया । किसी को बताने की जरूरत नहीं है कि प्रताप से जुड़ने के चलते उन्हें समझ आया कि कलम की ताकत के बल पर बहुत कुछ किया और बदला जा सकता हैं।

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भगत सिंह शहीदी दिवस
महान पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी के अखबार ‘प्रताप’ में भगत सिंह ने सदैव निर्भीक एवं निष्पक्ष पत्रकारिता की। सुतरखाना स्थित ‘प्रताप‘ प्रेस के पास तहखाने में ही एक पुस्तकालय भी बनाया गया, जिसमें सभी जब्त शुदाक्रान्तिकारी साहित्य एवं पत्र-पत्रिकाएं उपलब्ध थीं। भगत सिंह यहां पर बैठक घंटों ही पढ़ते थे। वस्तुत: प्रताप प्रेस की बनावट ही कुछ ऐसी थी कि जिसमें छिपकर रहा जा सकता था तथा फिर सघन बस्ती में तलाशी होने पर एक मकान से दूसरे मकान की छत पर आसानी से जाया जा सकता था। भगत सिंह ने तो ‘प्रताप‘ अखबार में बलवन्त सिंह के छद्म नाम से लगभग ढाई वर्ष तक कार्य किया। चन्द्रशेखर आजाद से भगत सिंह की मुलाकात विद्यार्थी जी ने ही कानपुर में करायी थी।
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प्रताप प्रेस की जर्जर बिल्डिंग
भगत सिंह ने घरवालों द्वारा शादी का दबाव डालने पर नाराज होकर घर छोड़ दिया। घर से जाते समय उन्होंने अपने पिता को पत्र लिखकर कहा, “मेरी ज़िन्दगी बड़े मकसद यानी आज़ादी-ए-हिन्द के असूल के लिए समर्पित हो चुकी है। इसलिए मेरी ज़िन्दगी में आराम और दुनियावी ख्वाहिशों और आकर्षण नहीं हैं।” भगत सिंह कानपुर जयचंद्र विद्यालंकार से “प्रताप” के संपादक और स्वतंत्रता सेनानी गणेश शंकर विद्यार्थी के नाम परिचय पत्र लेकर गये थे। कानपुर प्रवास के दौरान भगत सिंह ने अन्य कार्यों के साथ ही “प्रताप” के संपादकीय विभाग में भी काम किया था। अब ‘प्रताप’ की इमारत खंडहर में तबदील हो रही है, पर इमारत के बाहर एक स्मृति चिन्ह तक नहीं लगा जिससे पता चल सके कि इसका भगत सिंह के साथ किस तरह का संबंध रहा है। कानपुर से वर्तमान में कैबिनेट में दो मंत्री हैं। भगत सिंह को चाहने वाले इनसे उम्मीद लगाये बैठए हैं कि कम से कम भगत सिंह के नाम से कोई संग्रहालय या पुस्तकालय बना दिया जाये।  
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भगत सिंह शहीदी दिवस
28 सितंबर 1907 को गांव बावली जिला लायलपुर , पंजाब बांगा (अब पाकिस्तान) में जन्मे भगत सिंह  के पिता का नाम सरदार किशन सिंह और माता का नाम विद्यावती कौर था। यह एक सिख परिवार था। अमृतसर में 13 अप्रैल 1 9 1 9 को हुए जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड ने भगत सिंह की सोच पर गहरा प्रभाव डाला था। लाहौर के नेशनल कॉलेज़ की पढ़ाई छोड़कर भगत सिंह ने भारत की आज़ादी के लिये नौजवान भारत सभा की स्थापना की थी। 23 मार्च 1931 को भगत सिंह तथा इनके दो साथियों सुखदेव व राजगुरु को फाँसी दे दी गई। फाँसी पर जाते समय वे तीनों मस्ती से गा रहे थे -
मेरा रँग दे बसन्ती चोला, मेरा रँग दे;
मेरा रँग दे बसन्ती चोला। माय रँग दे बसन्ती चोला।।
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महान क्रांतिकारी राजगुरु
मराठी परिवार में जन्मे शिवराम हरि राजगुरु भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक प्रमुख क्रान्तिकारी थे। इन्हें भगत सिंह और सुखदेव के साथ 23 मार्च 1 9 31 को फांसी पर लटका दिया गया था। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में राजगुरु की शहादत एक महत्वपूर्ण घटना है। शिवराम हरि राजगुरु का जन्म 1908 में पुणे जिला के खेड़ा गांव में हुआ था। 6 साल की उम्र में पिता की मृत्यु हो जाने के बाद बहुत छोटी उम्र में ही वाराणसी विद्यानयन और संस्कृत सीखने आए थे। वाराणसी में विद्यायन किया करते हुए राजगुरू का सम्पर्क कई क्रान्तिकारियों से हुआ चन्द्रशेखर आजाद से इतने अधिक प्रभावित हुए कि उनकी पार्टी हिन्दूस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी से तत्काल जुड़ गए।
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सुखदेव
1907 को पंजाबी परिवार में जन्मे सुखदेव का पूरा नाम सुखदेव थापर था। वह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक प्रमुख क्रांतिकारी थे। उन्हें भगत सिंह और राजगुरु के साथ 23 मार्च 1 9 31 को फांसी पर लटका दिया गया था। इनकी शहादत को आज भी पूरे भारत में सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। सुखदेव भगत सिंह की तरह बचपन से ही आज़ादी की सपना पाले हुई थी। ये दोनों 'लाहौर राष्ट्रीय कॉलेज' के छात्र थे दोनों एक ही सन में लायलपुर में पैदा हुए थे और एक ही साथ शहीद हो गए थे। 
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