ब्रज की लठमार होली की तरह शाहजहांपुर की जूतामार होली भी देशभर में चर्चित है। होली के रंग-गुलाल के साथ जूते-चप्पलों की बौछार के बीच भैंसागाड़ी पर लाट साहब की सवारी पूरे ठाठ के साथ निकलती है। इतिहासकारों के अनुसार यह परंपरा अंतिम नवाब अब्दुल्ला खां द्वारा 1746-47 में किले पर पुन: कब्जा करने के बाद शुरू हुई थी। पहले जुलूस में हाथी, घोड़े, ऊंट आदि शामिल होते थे। स्थानीय लोगों के विरोध और बेपर्दगी के चलते लाट साहब की सवारी भैंसागाड़ी तय कर दी गई।
रंगों और उल्लास के पर्व होली पर लाट साहब का जुलूस निकालने और नवाबों के साथ होली खेलने की परंपरा की कोई निश्चित तिथि तो इतिहास में दर्ज नहीं है, लेकिन यह परंपरा करीब पौने तीन सौ साल पुरानी बताई जाती है। इतिहासकार नानक चंद्र मेहरोत्रा ने अपनी पुस्तक ‘शाहजहांपुर ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक धरोहर’ में लिखा है कि अंतिम नवाब अब्दुल्ला खां हिंदू और मुस्लिम समुदाय में समान रूप से प्रिय थे। उन्होंने अपनी बेटी की शादी हाफिज उल मुल्क से करने के लिए किले के निकट रंगमहल बनवाया था। वर्तमान में इसे रंगमहला कहा जाता है।