खतरे के निशान से करीब एक मीटर ऊपर जाने के बाद शनिवार की रात यमुना का जलस्तर घटने लगा, जबकि गंगा स्थिर हो गई। इससे शहरी इलाकों की ओर बाढ़ के प्रकोप के विस्तार पर एक बारगी ब्रेक लग गया है। केन बेतवा, चंबल का जलस्तर लगातार घटने और एमपी व राजस्थान के बांधों से यमुना में बड़ी जलराशि न छोड़े जाने से अब आगे बाढ़ का खतरा बढ़ने की आशंका भी नहीं रह गई है। इसी के साथ बाढ़ से मुसीबतें झेल रहे लोगों ने राहत की सांस ली है।
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एमपी व राजस्थान के बांधों से भारी मात्रा में पानी छोड़े जाने से पिछले पांच दिनों से यहां गंगा-यमुना खतरे के निशान से ऊपर बह रही हैं। दोनों नदियों के तटवर्ती इलाकों में अब तक ढाई लाख से अधिक की आबादी बाढ़ की चपेट में है। शनिवार को बाढ़ का पानी कछारी इलाकों से बढ़कर शहर की ओर रुख करने लगा। पत्रकार कॉलोनी में कई और घरों तक पानी आने से अफरातफरी मच गई। हालांकि शाम को गंगा-यमुना का पानी स्थिर हो गया और रात आठ बजे से नैनी में यमुना का जलस्तर आधा सेमी प्रति घंटा की रफ्तार से घटने लगा।
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सुबह से ही गंगा-यमुना के रुख में नरमी आ गई थी। एक सेमी प्रति घंटा की रफ्तार से बढ़ रही गंगा-यमुना भोर में आधा सेमी प्रतिघंटा की रफ्तार पर आ गईं। वहीं छतनाग में गंगा में आधा सेमी प्रति घंटा की रफ्तार से वृद्धि दर्ज की गई, लेकिन सिंचाई विभाग के अभियंताओं का कहना था कि वहां भी पानी अब बढ़ने की स्थिति नहीं है। अभियंताओं के अनुसार दोपहर से हमीरपुर में चार सेमी प्रति घंटा और बांदा में तीन सेमी प्रति घंटा की रफ्तार से यमुना का जलस्तर घटने लगा है।
गंगा का जलस्तर रात 10 बजे
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फाफामऊ -85.77 मीटर
छतनाग - 85.08 मीटर
यमुना का जलस्तर
नैनी - 85.68 मीटर
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खतरे का निशान- 84.73 मीटर
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साड़ी बांधकर लटकाई गई बाल्टी से ही ऊपर पहुंचाया जा रहा सामान
नदियों का जलस्तर खतरे के निशान से पार होने के बाद इसके किनारे बसे करेलाबाग, जेके नगर, गड्ढा कॉलोनी, मुल्ला कॉलोनी, गौसनगर आदि मोहल्लों में शनिवार को परेशानी और बढ़ गई। बाढ़ वाली सड़क, चौराहे पर जुटे लोग दिन भर यही चर्चा करते रहे कि शुक्रवार को पानी फलां खंभे के पास था, शनिवार को फलां मकान के पास तक पहुंच गया है। गड्ढा कॉलोनी के मकबूल अहमद बोले, जो लोग फंसे हैं, उनका बुरा हाल है। हालांकि उन्हें क्षेत्रीय लोगों के सहयोग से खाने-पीने की चीजें, पानी आदि मिल जा रहा है लेकिन घर से निकलना मुहाल है। बड़ी मुश्किल से ऊपरी मंजिल से उतरकर नाव के सहारे ही बाहर जाकर कुछ लाना मुमकिन हो पाता है। बिजली न होने से अंधेरा और सांप, बिच्छू आदि का खतरा बढ़ गया है। इसी तरह अब्दुल साकिब के मकान की निचली मंजिल का आधा हिस्सा पानी में डूबा है। पूरा परिवार ऊपरी मंजिल पर टिका है। जैसे-तैसे काम चल रहा है। अब इंतजार है कि पानी थमे तो सफाई शुरू हो।
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बिस्मिल्ला चौराहे के पास राजू कास्मेटिक की दुकान में आधे से ज्यादा पानी भर गया है। राजू बोले, काफी सामान टांड़ पर पहुंचा दिया था लेकिन अब पानी वहां भी पहुंचने लगा है। रात तक पानी टांड़ तक पहुंच गया तो हजारों रुपये का नुकसान होना तय है। चौराहे में कई मकान में लोग ऊपरी मंजिल पर अटके हैं। लोगों ने प्लास्टिक की बाल्टी में रस्सी या साड़ी बांधकर उसे नीचे लटकाकर नाव तक पहुंचाया और नाव से जरूरत की चीजें बाल्टी में रख दी गईं। फिर इसे ऊपर खींच लिया गया। इस तरह जरूरत की चीजें लोगों तक पहुंच रही हैं लेकिन घरों में कैद होने का दर्द उनके चेहरे पर साफ है।
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बाढ़ से चार फीडर और बंद, पांच हजार घरों की बत्ती गुल
खतरे के निशान से ऊपर पहुंची गंगा की बाढ़ से कई तटीय इलाकों में बिजली आपूर्ति व्यवस्था छिन्न भिन्न हो गई। यमुना बैंक रोड उपकेंद्र बंद होने के बाद गंगा किनारे के थरवई उपकेंद्र के स्विचयार्ड में भी पानी आ गया। इससे चार फीडरों पर बिजी आपूर्ति बंद हो गई। इससे करीब पांच हजार से अधिक घरों की बत्ती गुल हो गई है। उधर गंगानगर, बेली, बाघाड़ा और बख्शी बांध के बीच 15 से अधिक ट्रांसफारमर पानी आने की वजह से हटा दिए गए। जबकि कई ट्रांसफारमर जलमग्न हो गए हैं। थरवई उपकेंद्र में पानी आने से 35 गांवों और 60 मजरों की बिजी आपूर्ति ठप हो गई है।
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80 आरओ प्लांट बंद, 100 रुपये में बीस लीटर पानी
बाढ़ प्रभावित इलाकों में पेयजल के लिए हाहाकार मचा है। चारों तरफ पानी से घिरे मोहल्लों में रहने वाली पीने के पानी के लिए भटक रहे हैं। दिक्कत उन मोहल्लों में अधिक है, जहां पानी भरा है। यहां गली-गली खुले करीब 80 आरओ वाटर प्लांट बंद हो गए हैं। हालत यह है कि पानी की भी कालाबाजारी हो रही है। 20 रुपये में मिलने वाले 20 लीटर बोतल बंद पानी के लिए 100 रुपये तक वसूले जा रहे हैं। छोटा बघाड़ा, बड़ा बघाड़ा, सलोरी, ऊंचवागढ़ी, राजापुर, गंगानगर, ढरहरिया समेत अन्य इलाकों की हर गली और सड़क पर चलने वाले दस लोगों में चार लोग पानी की नीली बोतल या जार टांगे दिख रहे हैं। पेयजल के लिए भटक रहे लोग प्रभावित इलाकों के बाहर लगाए गए जलकल के टैंकरों से पीने का पानी लेना पसंद नहीं कर रहे हैं। लोगों की परेशानी का अब कालाबाजारी बेजा फायदा उठा रहे हैं।
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पानी के लिए मची मारामारी
पानी के लिए मची मारामारी में परेशान लोग मुंहमांगी कीमत पर बोतल बंद पानी खरीद रहे हैं। छोटा बघाड़ा में रहने वाले इविवि के छात्र संजीव, सीएमपी के छात्र मोहन, सलोरी में रहने वाले प्रतियोगी छात्र रमन, इसी मोहल्ले में रहने वाले केपी कॉलेज में इंटर के छात्र रज्जन, गंगानगर में रहने वाली प्रतियोगी छात्रा रोशनी ने बताया कि बाढ़ के कारण पानी की क्वालिटी और रेट में अंतर परेशान करने वाला है, लेकिन विकल्प न होने मजबूरी में ज्यादा दाम देना पड़ रहा है। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक बाढ़ प्रभावित कई मोहल्लों में स्कूली और प्रतियोगी छात्रों की संख्या अधिक है। इन छात्रों ने आरओ प्लांट वालों से कार्ड बनवा रखा है। बोतल के लिए जमानत राशि जमा कर हर दिन औसतन छात्र एक बोतल पानी के एवज में बीस रुपये अदा करते रहे हैं। अधिकांश छात्रों को सुविधा है कि होम डिलेवरी से पानी की बोतल उनके कमरे तक पहुंचती रही हैं। अब ऐसा नहीं है।
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आरओ प्लांट में भर गया पानी
बाढ़ ने पानी के व्यापार में लगे कुछ लोगों भारी चपत लगाई तो कुछ की लाटरी लग गई है। मोहल्लों तक पानी पहुंचा तो आरओ प्लांट वालों ने होम डिलिवरी बंद कर दी। बिजली कटी तो जनरेटर से प्लांट चलाए गए। इससे भाव दस रुपये बोतल बढ़ गया। एक बोतल पानी के 20 नहीं 30 रुपये वसूले जाने लगे। अब प्रभावित इलाकों की गलियों में खुले करीब 80 आरओ प्लांट पानी भरने से बंद हो गए हैं। इससे सैकड़ों लोगों को दूसरे मोहल्लों से पानी की बोतलें खरीद कर लानी पड़ रही हैं। प्लांट पर तो गनीमत है, लेकिन गाड़ियों पर मोहल्लों में जाकर बोतल बंद पानी पहुंचाने वाले एक बोतल पानी के एवज में 50 से 100 रुपये तक वसूल रहे हैं।
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दुर्गंध और गंदगी, सबकी नाक पर रुमाल
गंगा-यमुना का जलस्तर शनिवार को घटने लगा लेकिन लोगों की दुश्वारियां कम नहीं हुई हैं। कछारी मोहल्लों के पानी से घिरे घरों की छत पर डेरा जमाए लोगों की मुसीबतें गंदगी से बढ़ी हैं। भूतल ही नहीं गलियों में भरा गंदा पानी दुर्गंध फैला रहा है। हर तरफ गंदगी पसरी है। मच्छरों की भरमार है। लोग पानी में उतरें या बाढ़ देखने जाएं, दुर्गंध से बचने को नाक पर रुमाल रखना मजबूरी होती है। ऐसे में लोगों की दिनचर्या ही बिगड़ गई है।
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दवा न इलाज, दावे हजार, लोग बेजार
स्वास्थ्य विभाग का दावा है कि प्रतिदिन 1500 से 2000 पैकेट दवाओं के वितरित किए जा रहे हैं। जबकि हकीकत है कि कछारी इलाकों के बाढ़ प्रभावित इलाकों में फंसे हजारों लोगों तक इलाज और दवा की सुविधा नहीं पहुंच रही है। सारी कवायद राहत केंद्रों तक सिमटी है। द्रौपदी घाट के रमाकांत पटेल, ओम प्रकाश यादव, नन्हू, अमृत लाल दवा न मिलने की पीड़ा बताते हैं। उन्होंने बताया कि दवा की कौन कहे, डॉक्टर तक झांकने नहीं आए। यहां बच्चों समेत करीब 30 लोग बीमार है। सभी खुद इलाज करा रहे हैं, जबकि सभी बाढ़ पीड़ित हैं। राजुकमार और सुभाष मौर्या बताते हैं कि मुश्किल है कि सड़क पर सामान छोड़कर जाएं कहां।
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बाढ़ प्रभावित मोहल्लों में ढिबरी जलाने के लिए लोगों को मिट्टी का तेल नहीं मिल रहा है। मिट्टी के तेल समेत अन्य राहत सामग्री का वितरण उन्हीं को किया जा रहा है, जिनका प्रशासनिक अफसरों की सूची में नाम है। चूंकि सूची आधी-अधूरी है, इललिए अधिकतर लोग राहत सुविधा से वंचित हैं। द्रौपदी घाट में रहने वाली 85 बरस की नंदो देवी ने आरोप लगाया कि ‘चीन्ह, चीन्ह के दय रहै हैं मिट्टी के तेलवा... आटा, चाउर के तो पतय नय है।
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बाढ़ ने मुंबई, दुबई में रह रहे लोगों को भी कर दिया बैचैन
करेली की जेके नगर कॉलोनी, गड्ढा कॉलोनी, मुल्ला कॉलोनी आदि मोहल्लों में बाढ़ ने स्थानीय लोगों के साथ ही यहां से जुड़े लेकिन दूर बसे लोगों की नींद भी उड़ा दी है। इन मोहल्लों में बाढ़ से प्रभावित कई परिवार ऐसे हैं, जिनके पुरुष सदस्य कमाने के सिलसिले में मुंबई, सऊदी अरब, दुबई आदि जगहों पर हैं। अमर उजाला ने ऐसे परिवारों का हाल जानने की कोशिश की तो पता चला कि व्हाट्सएप, फेसबुक सहित परिजनों के माध्यम से जैसे-जैसे उन तक बाढ़ की खबरें पहुंच रही हैं, उनकी बेचैनी बढ़ती जा रही है।
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बाढ़ ने कम कर दिए रेलवे और रोडवेज के मुसाफिर
जिले में आई बाढ़ का असर रेलवे और रोडवेज पर भी पड़ने लगा है। सप्ताह भर में रोडवेज की आय में तकरीबन 30 फीसदी की गिरावट सप्ताह भर के दौरान आई है। इलाहाबाद जंक्शन से विभिन्न स्थानों की ओर जाने वाली ट्रेनों में भी यात्रियों की संख्या कम हुई है। बीते पांच दिन में ही इलाहाबाद जंक्शन, इलाहाबाद छिवकी, नैनी, प्रयाग, इलाहाबाद सिटी आदि रेलवे स्टेशनों के रिजर्वेशन काउंटर से काफी संख्या में टिकट निरस्त हुए हैं। ई टिकट को भी जोड़ लिया जाए तो बीते पांच दिन के दौरान तकरीबन चार हजार यात्रियों ने अपने टिकट निरस्त करवाएं हैं। यूपी रोडवेज के प्रयागराज परिक्षेत्र की बात करें तो बाढ़ की वजह से सप्ताह भर में ही यात्रियों की संख्या में काफी कमी आई है।
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हर साल बाढ़, हर साल बढ़ रहे मकान, कोई नहीं जिम्मेदार
गंगा और यमुना के तटवर्ती मोहल्लों में बाढ़ का प्रकोप जारी है। हजारों घराें में पानी घुस गया है लेकिन, विडंबना यह कि इस बाढ़ के दौरान भी कछारी इलाकों में जमीन की खरीद-बिक्री जारी है। पूरा कछार स्टेट लैंड है। इसके अलावा इस क्षेत्र में भवन निर्माण पर रोक है मगर, प्रथम तल तक पानी में डूबे निर्माणाधीन मकान पूरी व्यवस्था पर सवाल खड़ा कर रहे हैं। हालात यह हैं कि बख्शी बांध में एसटीपी के करीब तक मकानों का निर्माण हो रहा है तो छोटा बघाड़ा समेत एक दर्जन से अधिक मोहल्लों में नीचे तक मकान बन गए हैं। सैकड़ों की संख्या में बने इन मकानों में गंगा का जल स्तर बढ़ने के साथ ही पानी घूस जाता है और बाढ़ की स्थिति में छत पर गंगा बहने लगती हैं।
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प्रयागराज विकास प्राधिकरण सवाल उठने लगे हैं
बाढ़ में हजारों मकान डूबने के बाद जिला प्रशासन और प्रयागराज विकास प्राधिकरण के अफसरों पर एक बार फिर सवाल उठने लगे हैं। गंगा के कछारी इलाकों में बाढ़ का खतरा हर साल बढ़ता जा रहा है। विगत छह वर्षों में तीन बार गंगा और यमुना खतरे के निशान से काफी ऊपर बहीं तथा हजारों घर बाढ़ की चपेट आए। बाढ़ के इस खतरे को देखते हुए न्यायालय के आदेश पर इन इलाकों में स्थायी निर्माण पर रोक लगा दी गई है। प्रशासन की ओर से कछार में बने मकानों का सर्वे भी कराया गया। साथ ही निशान लगाए गए। आदेश हुआ कि इस निशान के बाद गंगा की तरफ कोई निर्माण नहीं होगा लेकिन वे निशान अब काफी पीछे छूट गए हैं। अपेक्षाकृत सस्ती जमीन होने की वजह से लोग सभी तरह का जोखिम उठाकर गंगा की गोद में मकान बनाने के लिए तैयार हैं।
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बाढ़ राहत शिविरों में बढ़ी भीड़
यमुना का जल स्तर घटने लगा है लेकिन बाढ़ राहत शिविरों में शनिवार को भीड़ बढ़ गई। जगह नहीं होने की वजह से मम्फोर्डगंज स्थित उमराव सिंह गर्ल्स इंटर कालेज शिविर में लोगों को वापस कर दिया गया। वहां से लोगाें को रानी रेवती देवी इंटर कालेज शिविर में भेजा गया। बेली, म्योराबाद आदि मोहल्लों में बाढ़ पीड़ितों की संख्या बढ़ गई है। इसका नतीजा है कि महबूब अली के बाद उमराव सिंह शिविर में सभी कमरे भर गए हैं। उमराव सिंह में भी सात कमरों में करीब 300 शरणार्थी हैं।
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प्रिंटिंग टेक्नोलॉजी की जगह एमएल कान्वेंट बना शिविर
प्रिंटिंग टेक्नोलॉजी राहत शिविर बंद हो गया है। इसकी वजह एमएल कान्वेंट स्कूल को बाढ़ राहत शिविर में तब्दील कर दिया गया है। सिविल डिफेंस के रविनेश श्रीवास्तव, संतोष पांडेय, कोमराज, अजय आदि ने शिविर में लोगों को सुविधाएं मुहैया कराने में मदद की।
सांसद के निर्देश के बाद करेलाबाग पहुंची राहत सामग्री
शनिवार को आखिरकार करेली क्षेत्र के करेलाबाग और ककरहाघाट में बाढ़ से प्रभावित लोगों के पास राहत सामग्री पहुंच ही गई। यहां एक दिन पहले निरीक्षण के दौरान इलाहाबाद की सांसद डा. रीता बहुगुणा जोशी से बाढ़ पीड़ित लोगों ने जिला प्रशासन से राहत सामग्री न मिलने की शिकायत की थी। इस पर सांसद ने जिला प्रशासन के अफसरों को निर्देश दिया था वहां राहत सामग्री की व्यवस्था करें।