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तस्वीरें: सिर्फ नागाओं को ही मिलती है अखाड़ों की कमान, प्रक्रिया जानकर हो जाएंगे हैरान

Sun, 20 Jan 2019 10:25 AM IST
vivek shukla हिमांशु पांडेय, अमर उजाला, प्रयागराज
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kumbh
संन्यासी अखाड़ों में नागाओं का खास रुतबा है। अखाड़े के भीतर हजारों साधु-संत होते हैं, लेकिन उसकी भीतरी व्यवस्था संभालने वाले पदाधिकारी सिर्फ नागा संन्यासी ही बनाए जाते हैं। नागा परंपरा में दीक्षित हुए बगैर कोई साधु अखाड़े का पद धारण नहीं कर सकता।
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kumbh
अखाड़ों की भीतरी संरचना काफी जटिल है। भीतरी व्यवस्था बनाए रखने के लिए थानापति, श्रीमंहत, कारोबारी, कोठारी, सचिव के पद होते हैं। थानापति पूरे अखाड़े में अनुशासन की देखभाल करता है। अनुशासन तोड़ने पर वह दंड का भी विधान कर सकता है। कारोबारी एवं कोठारी अखाड़े के वित्त संबंधी कार्य देखते हैं।
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kumbh
कोठरी का मुख्य कार्य अखाड़े के भीतर रसोई की व्यवस्था करना होता है। इन सबसे ऊपर सचिव होते हैं, जो मुख्यत: प्रशासनिक कार्य संभालते हैं। अखाड़ों से जुड़े सारे विधिक कार्य सचिव के मार्फत ही होते हैं। इसी तरह अखाड़ों की पूरे देश में जहां भी संपत्ति होती है, उसकी देखरेख को सिर्फ नागा संन्यासी ही भेजे जाते हैं।

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Naga Sadhu
देश के कई सारे प्रमुख मंदिर एवं मठ अखाड़ों के ही स्वामित्व में हैं। अखाड़ों के कार्यों की निगरानी के लिए अष्टकौशल नामक संरचना भी होती है, एक तरीके से अखाड़े की गवर्निंग बॉडी का काम करती है। इस अहम भीतरी संरचना में भी सिर्फ नागा संन्यासी शामिल रहते हैं। इस तरह अखाड़े की बाहरी एवं आंतरिक व्यवस्था पूरी तरह नागा संन्यासी पर ही केंद्रित रहती है।
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narendra giri
अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष नरेंद्र गिरि, रवींद्र पुरी, महानिर्वाणी के जमुना पुरी, रवींद्र गिरि, जूना के प्रेम गिरि, विद्यानंद सरस्वती आदि सभी नागा सन्यासी हैं लेकिन अब सामाजिक मर्यादाओं के चलते यह सामान्य तौर पर गेरुवा वस्त्र धारण करते हैं, लेकिन शाही स्नान अपने मूल स्वरूप में ही करते हैं। महानिर्वाणी अखाड़ा के सचिव जमुना पुरी का कहना है कि नागा संस्कार के बाद ही अखाड़ों की जिम्मेदारियां मिलती हैं। अष्टकौशल में भी सिर्फ नागा संन्यासी शामिल हो सकते हैं। 
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Juna Arena Arena Council President Narendra Giri meeting with other officials in discussion. - फोटो : amarujala
अद्भुत था संन्यास दीक्षा का वह क्षण: नरेंद्र गिरि
अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष एवं श्रीनिरजंनी अखाड़े के सचिव नरेंद्र गिरि अपनी नागा दीक्षा को याद करते हुए बताते हैं कि 1978 में घर का परित्याग करके वह साधु बन गए। निरंजनी अखाड़े से ही शुरुआत की। उनके गुरु भगवान गिरि ने उनको दीक्षा दी। अखाड़े में शुरुआत करने वाले साधु को महापुरुष की संज्ञा दी जाती है। महापुरुष को अखाडे़े की साफ-सफाई से लेकर खाना बनाने तक का काम करना होता है। उन्होंने करीब दस साल तक यह काम किया। इसके बाद 1996-97 में लगे इलाहाबाद के कुंभ में आचार्य महामंडलेश्वर महेशानंद गिरि ने कुंभ के दौरान उनकी नागा दीक्षा दी। श्रीमहंत नरेंद्र गिरि के मुताबिक वह उनके जीवन का सबसे उल्लासित कर देने वाला क्षण था हालांकि उसके बाद से ही लगातार अखाड़े की जिम्मेदारियां मिलने लगी। पहले सुकून की नींद मिलती थी लेकिन अब नींद कभी पूरी नहीं होती।
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