गंगा की रेती पर एक माह से ठीहा जमाए कल्पवासी अंतिम स्नान के साथ तंबू नगरी से विदा होने लगे। कल्पवासी कैंप के बाहर रोपे तुलसी के बिरवा समेत गंगा की मिट्टी एवं गंगाजल को संगम के प्रसाद की तरह अपने साथ ले गए। गंगा मइया से अगले साल दोबारा बुलाने की अरदास भी लगाई। कैंप के पड़ोसियों से विदा-विदाई करके गंगा मइया के जयकारे लगाते हुए अपने-अपने घरों की ओर रवाना हुए हालांकि बड़ी संख्या में कल्पवासी देर-रात तक सड़क मार्ग खुलने का इंतजार करते रहे।
सनातन परंपरा में गृहस्थ भी गंगा की रेती में साधना को पहुंचते हैं। पौष पूर्णिमा से आरंभ हुई उनकी साधना माघी पूर्णिमा को पूरी हुई। कल्पवास करने तकरीबन पूरे भारत से ही श्रद्धालु तंबुओं की नगरी पहुंचे। उत्तर प्रदेश समेत मध्य प्रदेश, बिहार, झारखंड, राजस्थान, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान से आए करीब दस लाख श्रद्धालुओं ने इस दफा कल्पवास किया।