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Kalpwas : तुलसी का बिरवा लेकर तंबुओं की नगरी से विदा होने लगे कल्पवासी, लगे गंगा मइया के जयकारे

Wed, 12 Feb 2025 07:37 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, महाकुंभ नगर (प्रयागराज)

सार

मां गंगा की गोद में एक माह तक जप तप और ध्यान करने वाले कल्पवासियों का एक माह का संकल्प पूरा हो गया। बुधवार को माघी पूर्णिमा पर संगम में डुबकी लगाने के बाद कल्पवासी पूरी गृहस्थी लेकर अपने घर के लिए रवाना हो गए। 
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कथा सुनने के बाद हवन करते श्रद्धालु। - फोटो : अमर उजाला।

गंगा की रेती पर एक माह से ठीहा जमाए कल्पवासी अंतिम स्नान के साथ तंबू नगरी से विदा होने लगे। कल्पवासी कैंप के बाहर रोपे तुलसी के बिरवा समेत गंगा की मिट्टी एवं गंगाजल को संगम के प्रसाद की तरह अपने साथ ले गए। गंगा मइया से अगले साल दोबारा बुलाने की अरदास भी लगाई। कैंप के पड़ोसियों से विदा-विदाई करके गंगा मइया के जयकारे लगाते हुए अपने-अपने घरों की ओर रवाना हुए हालांकि बड़ी संख्या में कल्पवासी देर-रात तक सड़क मार्ग खुलने का इंतजार करते रहे।

सनातन परंपरा में गृहस्थ भी गंगा की रेती में साधना को पहुंचते हैं। पौष पूर्णिमा से आरंभ हुई उनकी साधना माघी पूर्णिमा को पूरी हुई। कल्पवास करने तकरीबन पूरे भारत से ही श्रद्धालु तंबुओं की नगरी पहुंचे। उत्तर प्रदेश समेत मध्य प्रदेश, बिहार, झारखंड, राजस्थान, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान से आए करीब दस लाख श्रद्धालुओं ने इस दफा कल्पवास किया।

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माघी पूर्णिमा स्नान करने के बाद घर लौटते श्रद्धालु। - फोटो : अमर उजाला।

इस बार दो गुने से अधिक कल्पवासी पहुंचे

तीर्थ पुरोहित राजेंद्र पालीवाल के मुताबिक पिछली बार के मुकाबले करीब दो गुने से अधिक कल्पवासी पहुंचे हालांकि कल्पवासियों को संगम से काफी दूर बसाया गया था। इस वजह से कल्पवासी सिर्फ गंगा घाटों तक सिमट गए। कुंभ नगरी में आने-जाने को लेकर टोका-टाकी के चलते वह कहीं जा नहीं सके। शिविर के इर्द-गिर्द ही भजन-कीर्तन का क्रम चला।एक माह के दौरान शिविर में अगल बगल रहने से कल्पवासियों का एक-दूसरे से लगाव भी हो गया। रोजाना साथ में सभी स्नान को निकलते।

खाली समय बैठकर भगवत भजन करते। अब विदा-विदाई की वेला में बिछड़ने का दुख हो रहा है। धार्मिक अनुष्ठान पूरा करने के बाद प्रयागराज समेत आसपास के कल्पवासियों ने वापसी की राह थाम ली। वापसी से पहले कल्पवासी अपने संग गंगाजल, गंगा की मिट्टी भी साथ ले गए। घर-परिवार एवं रिश्तेदारों के लिए कुंभ मेले से लाई, इलायची दाना, कलवा, चूड़ी-बिंदी, सिंदूर का प्रसाद खरीदा। वहीं, तमाम कल्पवासी बुधवार रात तक सड़क मार्ग खुलने का इंतजार करते रहे। बृहस्पतिवर को ट्रैफिक प्रतिबंध खत्म होने के साथ वह घरों की ओर रवाना होंगे।

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संगम तट पर हवन करते श्रद्धालु। - फोटो : अमर उजाला।

क्षौर कर्म के बाद लगाई डुबकी, माथे पर लगाया त्रिपुंड

कुंभनगरी से विदाई से पहले कल्पवासियों ने गंगा तट पहुंचकर अपना क्षौर कर्म कराया। इसके बाद अपने संकल्प के मुताबिक गंगा में पांच, सात, ग्यारह एवं इक्कीस डुबकी लगाई। स्नान के पश्चात भगवान सूर्य का अर्ध्य अर्पित करके के साथ ही कल्पवास के दौरान हुई भूल के लिए मां गंगा से क्षमा याचना की। डुबकी के पश्चात माथे पर त्रिपुंड लगाकर वहां से विदाई ली।

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संगम में स्नान के बाद सूर्य को अर्घ्य देती महिला श्रद्धालु। - फोटो : अमर उजाला।

साधु-संतों के साथ गृहस्थ भी करेंगे त्रिजटा स्नान

फाल्गुन मास की तृतीया तिथि को साधु-संत समेत गृहस्थ भी त्रिजटा स्नान करेंगे। मान्यता है त्रिजटा स्नान से एक मास के कल्पवास के बराबर फल की प्राप्ति होती है। तमाम कल्पवासी भी इस स्नान के लिए अभी शिविरों में रहेंगे। मान्यता है कि माघ मास में प्रवास करने वालों के लिए त्रिजटा स्नान सर्वाधिक फलदायी होता है। जो लोग महीने भर संगम में डुबकी नहीं लगा पाते, वो इस तिथि पर स्नान कर पूरे महीने भर के कल्पवास का फल अर्जित कर लेते हैं।

ज्योतिषाचार्य दीपा तिवारी के मुताबिक पुराणों में त्रिजटा स्नान की मान्यता त्रेता युग में सीता के पंचवटी प्रवास से की गई है। मां सीता के लंका में रहने के दौरान त्रिजटा नामक राक्षसी ने उनकी सेवा की थी। मां सीता के आशीष से उसे मोक्ष मिला। मां सीता के वचन के मुताबिक ही त्रिजटा स्नान करने वालों को पुण्य लाभ होता है। 

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संगम में स्नान के बाद भगवान सूर्य को अर्घ्य देतीं महिलाएं। - फोटो : अमर उजाला।

बही खाते में दर्ज कराया अन्न दान

तीर्थ पुरोहितों के सम्मुख कल्पवासियों ने अन्न दान का संकल्प लिया। अपने सामर्थ्य के मुताबिक गेहूं, धान, चना समेत अन्न दान का संकल्प लिया। तीर्थ पुरोहितों ने यह संकल्प अपने बही में दर्ज कर लिया। यजमानों ने तीर्थ पुरोहितों को अपने यहां आमंत्रित करके फसल कटने पर अन्न उनको दान में देने का संकल्प लिया। फसल कटने पर तीर्थ पुरोहित उनके गांव जाकर यह संकल्प एकत्र करेंगे।

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