फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

प्रयागराज: 18 साल के छात्र ने फांसी लगाकर दी जान, इलाहाबाद विश्वविद्यालय की लचर व्यवस्था बनी वजह

Wed, 30 Jan 2019 06:08 PM IST
देव कश्यप न्यूज डेस्क, अमर उजाला, प्रयागराज
विज्ञापन
1 of 5
rajnikant yadav
"मैं ये सब अपनी मर्जी से किया, घर वालों मुझे माफ करना। भाई लोगों ने हमारे लिए बहुत कुछ किया, लेकिन मैं ही नहीं कर पाया। असली दिक्कत मकान मालिकों से है, हमें 4-5 महीने से कह रहा था कि तुम विश्वविद्यालय के हो तुमको नहीं रखेंगे। रोज-रोज यही सुनते कि कब जाओगे, कब मरोगे, उधर हॉस्टल के लिए पता करता तो हौसला सर रोज डांट के भगा देते थे। कल मैं गया बताया कि तबियत खराब है सर हमारी, तो कहे कि हम क्या करें जाओ कहीं मरो। भाईयों, अपने भाई के मौत की चिता को शांत मत रखना, उदय, अंकित यादव, राहुल भैया, अखिलेश इसका बदला जरूर लेना।"
ये बातें एक कागज पर लिखकर 18 साल के रजनीकांत यादव उर्फ गोलू ने फांसी के फंदे पर लटक कर जान दे दी।
विज्ञापन

2 of 5
suicide letter
गोलू पिछले साल आजमगढ़ से इण्टरमीडियट पास किया। बड़े सपने के साथ पूरब के आक्सफोर्ड कहे जाने वाले इलाहाबाद विश्वविद्यालय में एडमीशन ले लिया। हॉस्टल लेने के लिए फार्म भर दी, उसकी फीस जमा कर दी। 1 महीना बीता, 2 महीना बीता और देखते ही देखते 3 और 4 महीने बीत गए पर गोलू को हॉस्टल नहीं मिला। इस बीच वह बार-बार अपने मकान मालिक की खरी-खोटी सुनता रहा और जब न सुना गया तो उसने मौत को गले लगा लिया। 

 
विज्ञापन

3 of 5
rajnikant yadav
इस मौत का जिम्मेदार कौन है? मकान मालिक, विश्व विद्यालय प्रशासन या वर्षों से कमरा कब्जाए छात्रनेता
विश्वविद्यालय का ये रवैया बेहद पुराना रहा है। सत्र के शुरुआत में ही छात्रों हॉस्टल फीस के नाम पर मोटी रकम जमा करवा ली जाती है और फिर छात्रों को दौड़ाना शुरू किया जाता है। कई बार कमरा एलॉट भी कर दिया जाता है पर छात्र जब वहां जाते हैं तो पहले से ही वहां कोई सीनियर छात्र कब्जा किया रहता है जिसकी वजह से छात्र बेबस होकर वापस लौट आता है और प्रशासन से गुहार लगाता है, पर प्रशासन के कानों पर इतनी आसानी से कहां जूं रेंगती है।

 

4 of 5
rajnikant yadav
शहर में रूम रेंट एक्ट को लेकर कई बार आंदोलन हुए। छात्रनेता हर बार विश्व विद्यालय की प्राचीर से इसको लेकर वायदे करते हैं पर जैसे ही जीतते हैं ये मुद्दा एकदम गुम सा हो जाता है। शहर के मकान मालिक एकदम निरंकुश हो गए हैं, संवेदनशीलता मर सी गई है।आसमान छूते महंगा किराया एक दिन देरी से देने पर कमरा खाली करने का हुक्म जारी हो जाता है। मारपीट की घटनाएं तो अक्सर सुनने में ही आ जाती हैं।  

 
विज्ञापन
विज्ञापन

5 of 5
इलाहाबाद विश्वविद्यालय
जब भी वाशआउट की बात होती थी तो पुराने हॉस्टलरों का विरोध शुरू हो जाता था। कभी परीक्षा को लेकर तो कभी किसी और रूप में। जिन नेताओं को अपना कमरा अपने जूनियर्स के लिए छोड़ना था उन्होनें छोड़ा ही नही और नतीजा आज हमारे सामने है। बहरहाल अब रजनीकांत यादव उर्फ गोलू को इंसाफ कैसा मिलेगा, विश्वविद्यालय प्रशासन की नींद कब टूटेगी, क्या मकान मालिकों के निरंकुशपन पर कोई रोक लग पाएगा या फिर चन्द दिनों बाद इस घटना को भी भुला दिया जाएगा।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें