फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

वृंदावन कुंभ मेला: 200 साल से कुंभ दर कुंभ धर्मनगरियों का भ्रमण कर रहे 'ठाकुरजी'

Sat, 20 Feb 2021 12:03 AM IST
मुकेश कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मथुरा-वृंदावन
विज्ञापन
1 of 5
वृंदावन कुंभ मेला 2021 - फोटो : अमर उजाला
वृंदावन के कुंभ पूर्व वैष्णव बैठक में देश भर से अखाड़े और खालसा आ रहे हैं। अब तक यहां लगभग 100 खालसा यहां आ चुके हैं। सभी के साथ अपने इष्टदेव हैं, जो कुंभ दर कुंभ भ्रमण करते हैं। इसमें कोई 100 साल पुरानी परंपरा के तहत कुंभ भ्रमण पर हैं तो किसी खालसे में 200 साल बाद ठाकुरजी एक बार फिर वृंदावन पहुंचे हैं। श्रद्धालु भी अपने लड्डू गोपाल को लेकर वृंदावन कुंभ में पहुंच रहे हैं।
विज्ञापन

2 of 5
वृंदावन कुंभ मेला 2021: एक पंडाल में विराजमान ठाकुरजी - फोटो : अमर उजाला
वसंत पंचमी से शुरू हुए वृंदावन कुंभ में सभी खालसा और अखाड़ों के साथ ठाकुरजी भी आए हैं, जिनके लिए यमुना के तट पर मंदिर बनाते हुए विराजमान कर दिया गया है। इन अखाड़े और खालसों में ठाकुरजी की परंपरागत नियमित सेवा हो रही है। कहीं फल और मेवा तो कहीं टिक्कर का भोग लग रहा है।
विज्ञापन

3 of 5
वृंदावन कुंभ मेला 2021: एक पंडाल में विराजमान ठाकुर - फोटो : अमर उजाला
अखिल भारतीय श्रीपंच हरिव्यासी निर्वाणी अखाड़े के श्रीमहंत राधेश्याम दास करनाल से आए हैं। साथ में लड्डू गोपाल हैं, जिनकी आठ पहर सेवा हो रही है। वे बताते हैं कि ठाकुरजी को वहीं भोग लगता है तो आश्रम में बनता है। वृंदावन में उनका तीसरा कुंभ है। गुरु परंपरा के अनुसार वे ठाकुरजी के साथ प्रत्येक कुंभ हरिद्वार, नासिक, प्रयागराज और उज्जैन जाते हैं।

4 of 5
वृंदावन कुंभ मेला 2021: मेले में आते साधु-संत - फोटो : अमर उजाला
संकट मोचन हनुमान मंदिर सूरत से आए महंत प्रेमदास बताते हैं कि गुरु परंपरा के अनुसार पांच पीढ़ियों से नृसिंह भगवान कुंभ भ्रमण कर रहे हैं। उनके यहां ठाकुरजी के कुंभ भ्रमण की परंपरा करीब दो सौ साल पुरानी है। वृंदावन के बाद हरिद्वार जाएंगे। भगवान श्रीकृष्ण की जन्म और लीला भूमि में ठाकुरजी की नित्य सेवा हो रही है।
विज्ञापन
विज्ञापन

5 of 5
वृंदावन कुंभ मेला 2021 में साधु-संतों और श्रद्धालुओं की भीड़ - फोटो : अमर उजाला
जूनागढ़ सौराष्ट गुजरात में श्रीराम मंदिर से आए महंत रामेश्वरदास बताते हैं कि पूर्व से तो यहां बेहतर व्यवस्थाएं की गई हैं, लेकिन कुंभ जैसी नहीं हैं। ठाकुरजी के लिए मंदिर तक नहीं बना। फिलहाल ठाकुरजी को कुर्सी पर विराजमान किया गया है। उन्होंने बताया कि प्रत्येक कुंभ में अखाड़ा जाता है तो संतों के साथ ठाकुरजी भी कुंभ जाते हैं। सदियों से यह परंपरा चली आ रही है।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें