उटंगन नदी का किनारा इन दिनों चीख और सिसकियों से गूंज रहा है। दशहरा पर यहां लोग देवी प्रतिमा लेकर जयकारों के साथ विसर्जन करने पहुंचे थे, मगर आज मातम है। नदी के गहरे गड्ढे में समा गए कुसियापुर गांव के 12 लोग पूरे इलाके को गमगीन कर गए। 5 शव मिल चुके हैं, लेकिन 7 परिवारों की आंखें अब भी नदी की लहरों में अपनों को तलाशती रहीं।
घटना के तीसरे दिन भी सुबह से ही सर्च ऑपरेशन चला लेकिन शाम तक मायूसी ही हाथ लगी। सैकड़ों की भीड़ में नदी में अपनों को तलाशती आंखें सूरज ढलने के साथ पथरा गईं। नेशनल डिजास्टर रिस्पांस फोर्स (एनडीआरएफ), स्टेट डिजास्टर रिस्पांस फोर्स (एसडीआरएफ) और सेना की टुकड़ी के अलावा अन्य गोताखोरों ने पूरी ताकत झोंक दी। मगर, ओझल हुए 7 लोगों का कोई सुराग नहीं मिला।
2 अक्तूबर को घटना वाले दिन से ग्रामीण नदी के किनारे डटे हुए हैं। नदी में डूबे लोगों के परिजन तो बार-बार बेसुध हो जाते हैं। हर कोई गोताखोर को उम्मीद की निगाहों से देखता है, नहीं में सिर हिलाने पर मायूस हो जाता है।
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नदी में उतरे ग्रामीण, बना डाला बांध
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
नदी में उतरे ग्रामीण, बना डाला बांध
दो दिन तक चले सर्च ऑपरेशन के बाद भी जब 7 लोगों का पता नहीं चला तो कुसियापुर के अलावा अन्य गांवों के तैराक भी हिम्मत दिखाते हुए नदी में उतरे। शनिवार सुबह 400 ग्रामीण हाथों में तसला-फावड़ा लेकर पहुंच गए। ग्रामीणों ने पानी का बहाव रोकने के लिए खाली सीमेंट की बोरियों में मिट्टी भरकर नदी पर बांध बनाना शुरू किया। शाम होते-हाेते ग्रामीणों ने नदी के एक किनारे से दूसरे किनारे तक करीब 10 फीट मिट्टी डालकर बांध बना दिया। उधर, प्रशासन ने बुलडोजर लगाकर बांध से पहले एक अस्थायी नाला तैयार कर दिया। इससे नदी की धारा बदल गई है।माना जा रहा है कि इससे डूबे लोगों की तलाश में कुछ आसानी होगी।
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विलाप करती महिलाएं
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
बिस्किट-पानी पहुंचाते रहे ग्रामीण
नदी पर बांध बना रहे लोगों की मदद के लिए भी ग्रामीण ही आगे बढ़े। दोपहर में तेज गर्मी और भूख का असर कम करने के लिए लोग लगातार बिस्किट और पानी की व्यवस्था करते रहे। माैके पर काम कर रहे लोगों का कहना था कि राहत कार्य में लगी प्रशासनिक मशीनरी के कमजोर पड़ने पर ग्रामीणों ने राहत कार्य में साथ देने का निर्णय लिया है।
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बेसुध हुई महिला
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
नहीं जाना चाहता था नदी में नहाने
नदी किनारे पर एक पेड़ की छांव में बैठे भूरा ने बताया कि उनका भाई ओकेंद्र (16) भी मूर्ति विसर्जन के समय आया था। वह भी नदी पर आए थे, लेकिन स्नान करने के बाद चले गए थे। ओकेंद्र नदी में नहाने नहीं जाना चाहता था, लेकिन कुछ लोग जबरदस्ती उसे गोद में उठाकर ले गए और वह हादसे का शिकार हो गया। उसको लेकर नदी में पहुंचे सभी लोग लापता हैं। ओकेंद्र डीजे बजाने का काम करता था।
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घर बैठा पिता
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
बचाने में डूबा गजेंद्र
भूरा के पास ही बैठे तुलाराम ने बताया कि उनका भतीजा गजेंद्र (20) भी हादसे का शिकार हुआ है। वह 12वीं कक्षा में पढ़ रहा था। नदी में पहले 5 लोग गए थे। गजेंद्र तैरना जानता था। जब वह लोग डूबने लगे तो गजेंद्र उन्हें बचाने के लिए पहुंचा, लेकिन खनन के गहरे गड्ढे में वह भी समा गया। इसके बाद अन्य लोग उन्हें बचाने के लिए गए तो वह भी हादसे का शिकार हो गए।
ट्राॅली में भरी थीं लकड़ियां
ऊटंगन नदी के किनारे पर सैकड़ों ग्रामीण और राहत बचाव दल लापता लोगों की तलाश में थे। किनारे के पास खाली पड़ी जमीन पर चार पहिया और दोपहिया वाहनों की अच्छी खासी संख्या थी। वहीं पर एक ट्राॅली में लकड़ियां भरी हुईं थीं। पूछने पर ग्रामीणों ने बताया कि अब उम्मीद टूटती जा रही है। एक ग्रामीण ने हाथ का इशारा कर बताया कि यह राख पांच चिताओं की हैं। इतना कहते ही वह लोग गमगीन हो गए और नदी के किनारे की ओर चल दिए।