वो रात...जब कोरोना वायरस की दूसरी लहर आगरा में चरम पर थी। कोरोना संकट के बीच ऑक्सीजन के लिए हाहाकार मचा था। अस्पतालों में भर्ती करीब 200 मरीज जिंदगी और मौत से जूझ रहे थे। उस 27 व 28 अप्रैल की रात में शहर के 14 अस्पतालों में ऑक्सीजन खत्म हो गई थी। प्रशासन के हाथ पांव फूल गए। उस रात को न जिलाधिकारी सोये और न कमिश्नर। जिलाधिकारी खुद ऑक्सीजन के इंतजाम के लिए दौड़ते रहे। इस बीच जिलाधिकारी के पास फोन कॉल आया। यह कॉल एक ऑक्सीजन टैंकर चालक ने किया। चालक ने ऐसी जानकारी दी, जिससे उम्मीद बंधी। इसके बाद ऑक्सीजन टैंकर चालक, आईएमए के पूर्व सचिव और रिफाइनरी के प्रवर्तन निदेशक के सहयोग से सांसें गिन रहीं 200 जिंदगियों की जान बचाई जा सकी। अगली स्लाइड्स में पढ़िए इन तीन नायकों की कहानी....
ऑक्सीजन प्लांट में जिलाधिकारी प्रभु एन. सिंह (फाइल)
- फोटो : अमर उजाला
जिलाधिकारी प्रभु एन. सिंह ने कहा कि वो रात बड़ी भयानक थी। रातभर मेरा फोन बजता रहा। ऑक्सीजन की व्यवस्था के लिए इधर-उधर दौड़ता रहा। कहीं से ऑक्सीजन मिल जाए तो मरीज बच जाएं। अचानक मेरे पास ऑक्सीजन टैंकर चलाने वाले चालक देवेश गौतम का फोन आया।
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ऑक्सीजन टैंकर चालक देवेश गौतम (बायें), जिलाधिकारी प्रभु एन. सिंह (दायें)
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चालक देवेश गौतम ने बताया कि मथुरा रिफाइनरी में लिक्विड मेडिकल ऑक्सीजन (एलएमओ) उपलब्ध है। ये बात खुद रिफाइनरी अधिकारियों को नहीं पता थी। मैंने वहां प्रवर्तन निदेशक एके मैत्री से बात की, तो उन्होंने कहा कि एलएमओ उपलब्धता की मुझे जानकारी नहीं। मैंने उनसे कहा, मेरी जानकारी बिल्कुल सही है आप चेक करिए।
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प्रवर्तन निदेशक एके मैत्री
- फोटो : अमर उजाला
रिफाइनरी के अधिकारियों ने चेक किया तो एलएमओ मिल गई। रात में ही देवेश 3000 लीटर क्षमता का टैंकर लेकर रिफाइनरी पहुंचा। वहां एके मैत्री ने ही अपने उपकरण देकर टैंकर को भरवाया।
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आईएमए पूर्व सचिव डॉ. संजय चतुर्वेदी
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इधर, अस्पताल संचालकों से लेकर मरीजों के तीमारदारों को आईएमए पूर्व सचिव डॉ. संजय चतुर्वेदी ने संभाला। उन्होंने अन्य उपकरणों के इस्तेमाल से मरीजों की सांसों की डोर नहीं टूटने दी। सुबह पांच बजे से पहले टैंकर आया, जिसे हमने आठ बड़े अस्पतालों में बांटा। यहां 150 से अधिक गंभीर मरीज थे, जिन्हें ऑक्सीजन की जरूरत थी।
देवेश गौतम दोबारा रिफाइनरी गया और वहां से एक और टैंकर लिक्विड मेडिकल ऑक्सीजन भरकर लाया। इसे बाकी अस्पतालों में बांटा। इस तरह उस रात दो टैंकरों से 200 गंभीर मरीजों को दम तोड़ने से बचाया गया।