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ताजनगरी के लिए धड़कता था नीरज का दिल, नाम सुनते ही दौडे़ आते थे श्रोता

Fri, 20 Jul 2018 10:15 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, दिल्ली
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गोपाल दास नीरज - फोटो : अमर उजाला
गीतों के राजकुमार गोपाल दास नीरज का दिल ताजनगरी के लिए धड़कता था। मोहब्बत के इस शहर में उन्हें मोहब्बत हुई मनोरमा से। वह कवियत्री बनना चाहती थीं। गोपालदास नीरज के संपर्क में आई, दोस्ती हुई और फिर प्यार हो गया। इसके बाद नीरज कहने लगे, आगरा मेरी ससुराल हो गया है। उन्हें जितनी मोहब्बत इस शहर से रही, उतने ही दीवाने शहर के लोग रहे उनकी कविताओं के।
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अपने बेटे के साथ कवि गोपाल दास(फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला
ताज महोत्सव में कवि सम्मेलन होने जा रहा है, इसमें गोपाल दास नीरज भी काव्यपाठ करेंगे, बस पोस्टर पर इतना ही लिखना काफी था, पंडाल छोटे पड़ जाते थे। नीरज सब कवियों के बाद में कविता पढ़ते। श्रोता उनके इंतजार में बैठे रहते थे। कवि सम्मेलन सूर सदन में हो, सदर में हो, ताज महोत्सव में हो या फिर कहीं और, गोपालदास नीरज का नाम ही हिट होने की गारंटी था। लोग फरमाइश करते थे, ऐ भाई जरा देखके चलो, बस यही अपराध में हर बार करता हूं जैसे गानों की डिमांड की जाती थी उनसे।
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अमर उजाला काव्य की वेबसाइट के शुभारंभ के दौरान कवि गोपालदास नीरज (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला
गीतों के राजकुमार गोपालदास ‘नीरज’ ने अपनी लंबी काव्य यात्रा में मंच पर अंतिम बार काव्य पाठ आगरा में अमर उजाला के मंच पर किया था। तारीख थी दो जुलाई 2017, स्थान सूर सदन प्रेक्षागृह आगरा, मौका था अमर उजाला काव्य महाकुंभ का। इसमें उन्हें काव्य रत्न सम्मान से नवाजा गया था। इस मौके पर छह कवियों को काव्य भूषण और 26 को काव्य श्री सम्मान दिया गया था। 
 

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अमर उजाला काव्य की वेबसाइट का शुभारंभ करते कवि गोपालदास नीरज - फोटो : Amar Ujala
गोपालदास ‘नीरज’ ने मंच से काव्य पाठ किया तो पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा था। काव्य महाकुंभ में गीतकार संतोष आनंद,  शायर राहत इंदौरी, कवि हरिओम पंवार, सोम ठाकुर, प्रदीप चौबे, रमेश मुस्कान, पवन आगरी मौजूद रहे।
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‘शब्द के क्षरण का दौर चल रहा है’

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gopaldas neeraj
अमर उजाला काव्य महाकुंभ में गोपाल दास ‘नीरज’ ने अमर उजाला से बातचीत में कहा था, यह दौर भ्रम का है, युवा भटक रहा है, साहित्य की ओर रुझान कम हो रहा है, शब्द के क्षरण का दौर चल रहा है। उन्होंने कहा था, एक दौर था, जब फिल्मी गीतों में संदेश छिपा होता था, इस दौर के गीतों की जीवन यात्रा बहुत कम होती है, कुछ दिन बात वह भुला दिए जाते हैं। इतिहास खुद को दोहराता है, गीत, गजल और साहित्य के उपासकों को फिर वह दौर हासिल होगा।
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