चंबल नदी में रविवार को घड़ियालों की हैचिंग (अंडे सेने की प्रक्रिया) शुरू हुई। बाह के महुआशाला में 150, इटावा के कसौआ और खेड़ा अजब सिंह में जन्मे 500 घड़ियाल शिशु चंबल नदी में पहुंच गए। घोसलों से आई सरसराहट की आवाज पर पहुंची मादा घड़ियाल ने बालू में घोसलों को कुरेदा और अंडों को तोड़ा। उनसे निकले नन्हे मेहमानों को नदी में पहुंचना ने नर घड़ियालों ने मदद की।
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चंबल नदी में पहुंचे घड़ियाल शिशु
- फोटो : अमर उजाला
दुनियाभर में लुप्तप्राय स्थिति में पहुंचे घड़ियालों का चंबल नदी में संरक्षण हो रहा है। पहले घड़ियालों के अंडों को हैचिंग के लिए कुकरैल प्रजनन केंद्र लखनऊ ले जाना पड़ता था। अब 10 साल से चंबल नदी में प्राकृतिक (अंडे सेने की प्रक्रिया) हैचिंग हो रही है। 65 से 70 दिन का हैचिंग का समय शुरू होने पर वन विभाग ने घोसलों पर लगी जाली हटा दी है। बता दें कि नेस्टिंग के टाइम पर वन विभाग ने जीपीएस से लोकेशन ट्रेस कर जाली लगाई थी ताकि वन्यजीव इनके अंडों को नष्ट न कर सकें।
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अंडों से निकले नन्हे घड़ियाल
- फोटो : अमर उजाला
रविवार को बाह के महुआशाला में चंबल की बालू में नेस्टों से सरसराहट की आवाज आने पर नदी से निकल कर मादा घड़ियाल पहुंचकर अंडों को निकालकर तोड़ा तो घड़ियाल शिशु बाहर निकले। महुआशाला से 150 बच्चे चंबल नदी में पहुंचे हैं। इसी तरह से इटावा के कसौआ और खेड़ा अजब सिंह में 500 नन्हें मेहमानो की दस्तक के साथ ही वन विभाग ने राजस्थान से सटे रेहा से लेकर इटावा से लगे उदयपुर खुर्द तक निगरानी बढ़ा दी है। बाह के रेंजर अमित सिसौदिया और इटावा के रेंजर सर्वेश भदौरिया ने बताया कि हैचिंग पीरियड शुरू होने पर जाली हटा दी गई थी। इस बार समय से पहले हैचिंग शुरू होना सुखद रहा। नेस्टों और घड़ियाल शिशुओं की सुरक्षा के लिए टीमें लगी हैं। इनकी दिन-रात देखभाल की जा रही है।
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चंबल नदी में घड़ियाल
- फोटो : अमर उजाला
नेस्टिंग स्थल से सरसराहट की आवाज आते ही मानो मादा घड़ियाल के लिए उनके नन्हें शिशुओं का बुलावा है। फिर क्या? मादा घड़ियाल नदी से निकलकर नेस्टिंग स्थल पर पहुंच जाती हैं। अंडों से निकले बच्चे बालू पर सरकते हुए नदी की ओर जाते हैं। जहां किनारे पर नर घड़ियाल इन बच्चों की आगवानी करते दिखते हैं। पानी में बच्चे घड़ियाल की पीठ पर अठखेलियां करते हैं, सभी बच्चों के नदी में पहुंचने पर मादा भी आ जाती है। यह खूबसूरत नजारा देखकर वन कर्मी भी आश्चर्य चकित रह गए। विशेषज्ञ सत्येंद्र शर्मा बताते हैं कि बालू की ऊपर सतह पर रहने वाले अंडों से नर और निचली सतह पर रहने वाले अंडों से मादा शिशु का जन्म होता है। ऊपरी सतह के अंडे 45 डिग्री सेंटीग्रेट तथा निचली सतह के अंडे 33 डिग्री सेंटीग्रेट के तापमान के करीब बालू में रहते हैं। स्वस्थ अंडे का वजन करीब 112 ग्राम होता है। जन्म के तीन माह तक इनको भोजन की जरूरत नहीं पड़ती।
घड़ियाल शिशुओं को बडी मछली, बगुले जैसे पक्षी तो खा ही लेते है। बाढ़ से सर्वाधिक नुकसान होता है। नदी में पानी में बह कर खादर में पहुंचने वाले घड़ियाल शिशुओं को बिषखापर, सांभर आदि वन्यजीव आदि भक्षण कर लेते हैं। इसलिए कम बच्चे बच पाते है। रेंजर अमित सिसौदिया ने बताया कि घड़ियाल करीब पांच प्रतिशत ही बच पाते हैं। 2008 में चंबल नदी में एक साथ 100 से ज्यादा घड़ियालों की मौत होने से प्रोजेक्ट खतरे में पड़ गया था। घड़ियालों का जीवन बचाने के लिए तब विदेशी विशेषज्ञ बुलाने पडे़ थे। उसके बाद से घड़ियालों का कुनबा साल दर साल बढ़ा है।