ब्रज मंडल में जगह-जगह लठामार होली की मान्यता है, लेकिन गोकुल में छड़ीमार होली का आयोजन होता है। इसके पीछे भगवान कृष्ण का गोकुल में बीता बचपन है। मान्यता है बाल कृष्ण भगवान के साथ गोपियां छड़ी हाथ में लेकर होली खेलती हैं, क्योंकि भगवान बालस्वरूप थे। इस भावमयी परंपरा के अनुरूप कहीं उनको चोट न लग जाए, इसलिए गोकुल में छड़ीमार होली खेली जाती है।
गोकुल स्थित नंदकिला नंदभवन सेवायत मथुरादास पुजारी नंदबाबा ने बताया कि छड़ीमार होली का उत्सव सदियों से चला आ रहा है, जो आज एक परंपरा बन चुका है। गोकुल की छड़ी मार होली खुद में एक अनोखी विरासत समेटे हुए हैं। प्राचीन परंपराओं का निर्वहन करते हुए आज भी इस छड़ी मार होली का आयोजन होता है, जिसमें गोकुल की छड़ी मार होली की शुरुआत यमुना किनारे स्थित नंदकिले के नंदभवन में ठाकुरजी के समक्ष राजभोग का भोग लगाकर होती है।