ताजनगरी में मुगलकालीन इत्र की खुशबू के कद्रदान अब भी हैं। कश्मीरी बाजार में 350 साल पुरानी लाला प्रियादास की ताजिर इत्र की सबसे ऊंची दुकान मौजूद है। सातवीं पीढ़ी के किशोर कुमार पुरखों की विरासत को सहेजे हुए हैं। इस दुकान में आज भी कई किस्म का प्राकृतिक इत्र मिल जाएगा। रमजान में इत्र के खरीदारों में इजाफा हो जाता है, क्योंकि ईद की नमाज इत्र लगाकर अदा करना सुन्नत माना जाता है।
विज्ञापन
2 of 6
350 साल पुरानी इत्र की दुकान पर बैठे किशोर कुमार और उनके परिजन
- फोटो : अमर उजाला
'कौन बनेगा करोड़पति' में अमिताभ बच्चन ने जब कश्मीरी बाजार की इत्र की खुशबू का जिक्र किया तो लाला प्रियादास और उनके 500 साल पुराने इत्र के कारखाने का उल्लेख किया। कश्मीरी बाजार में अकबर के सिपाहसालार मौतबद खां ने मस्जिद का निर्माण कराया। इसी मस्जिद के अगले हिस्से में कई दुकानों में लाला प्रियादास का इत्र का कारखाना और दुकान है।
विज्ञापन
3 of 6
इत्र की दुकान में उंट की खाल से बना इत्र रखने का बर्तन
- फोटो : अमर उजाला
पहले यह दुकान 15 फीट ऊंची होती थी, लेकिन आज सड़क से छह फीट ऊंची रह गई है। इसमें कोई बदलाव नहीं किया। पहले मुगल सरदार व नवाब घोड़े और हाथी पर बैठकर ही इस दुकान से इत्र खरीदते थे। इत्र बनाने के विशेषज्ञ किशोर कुमार ने बताया कि पहले आगरा का पानी शुद्ध था। मगर, यमुना के दूषित पानी ने फूलों की खुशबू पर अपना असर छोड़ा है। खारे पानी के कारण फूलों की खेती भी उजड़ गई। अब आगरा में फूलों की खेती भी कम हो गई है।
4 of 6
इत्र की दुकान के कारखाने में रखे पुराने बर्तन
- फोटो : अमर उजाला
इस कारखाने में ताजमहल में उगने वाले मौहरश्री, मोतिया, इटौरा का गुलाब से इत्र बनाया जाता था। यहां इत्र पुराने तरीके से बनाया जाता था, लेकिन करीब 35 साल पहले उन्होंने कारखाना बंद कर दिया। प्राकृतिक इत्र की कीमतें आसमान छू रही हैं। सफेद ऊद या अगर का इत्र अब देशभर में शायद ही कहीं मिल सके। यह डेढ़ करोड़ रुपये का एक किलो आता है।
विज्ञापन
5 of 6
पुराने बर्तन में इत्र भरते किशोर कुमार
- फोटो : अमर उजाला
आजकल लोग गुलाब, खस, संदल, मोतिया, मोंगरा, चमेली, कदंब, मौलश्री, मुश्क के प्राकृतिक इत्रों के साथ ही दिल्ली व कन्नौज से आने वाले इत्र जन्नत उल फिरदौस, हिना, मदीना, कल्प बेला को खरीद रहे हैं। किशोर कुमार अब इन्हीं इत्रों की खुशबू आपस में मिलाकर प्रयोग करके नए इत्र बनाते हैं। उनका कहना है कि उनके बाबा प्रियादास ने दुकान का नाम रखा। वह इस पीढ़ी के सातवें सदस्य हैं। अब उनके बेटे भी इस कारोबार को नहीं करते हैं।