चार पीढ़ियों से रावण का पुतला बनाने में जुटा है। 65 साल के छोटेलाल फारुखी व उनके परिवार को मथुरा ही नहीं, आसपास के जनपदों में भी रावण, मेघनाथ और अहिरावण के पुतले बनाने के लिए बुलाया जाता है। छोटे लाल फारुखी बताते हैं कि उनकी पीढ़ियां 100 वर्षों से रावण का पुतला बनाती आ रही हैं। दादा अलीबक्श और पिता मुगल भी मथुरा और आसपास के जनपदों में जाकर रावण का पुतला बनाते थे।
छोटेलाल फरुखी का कहना है कि लगभग एक से डेढ़ माह के भीतर वह रावण का पुतला बना लेते हैं। 15 से 18 कारीगरों को इसमें लगाया जाता है। दशहरे पर रावण का पुतला जलाने के वक्त वह मैदान पर ही रहते हैं। साथी कारीगर जावेद अली ने कहा कि पुतले बनाने के साथ वह लोग भाईचारे की कामना भी करते हैं।
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